Kol created in nature from the script of society
Kol created in nature from the script of society षृषपहाड़ (दुदुलुम बुरु) : वारङ चिति लिपि का पुनर्जन्म स्थल
हो समाज की अमूल्य धरोहर वारङ चिति लिपि का पुनः खोज और प्रमाण इसी षृषपहाड़ (उड़िया में पराबड़ी पर्वत, हो भाषा में दुदुलुम बुरु) से जुड़ा हुआ है। यही वह पवित्र पर्वत है जहाँ ओत गुरु कोल लको बोदरा जी ने 40 दिनों की कठिन तपस्या करके प्रकृति से संवाद साधा और दिव्य ज्ञान अर्जित किया।
कहा जाता है कि इस तपस्या के दौरान वे देवी-देवताओं से आत्मिक रूप से जुड़े और वहीं से उन्होंने मानवता को मार्गदर्शन देने वाली आदि लिपि – वारङ चिति का पुनर्जन्म कराया।
गूगल मैप पर देखने से स्पष्ट होता है कि इस पर्वत की सतह पर ही प्रकृति द्वारा रचित वारङ चिति लिपि का मूल अक्षर आज भी दृष्टिगोचर है। यह केवल एक भौगोलिक आकृति नहीं, बल्कि सजीव प्रमाण है कि यह लिपि कोई मानवीय कल्पना नहीं, बल्कि प्रकृति प्रदत्त, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक सत्य है।
ओत गुरु जी ने स्पष्ट कहा था – “वारङ चिति लिपि ही आदि लिपि है, यही प्राकृतिक, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक लिपि है।”
उनका विश्वास था कि जिस दिन यह लिपि पूरी दुनिया में प्रकाशित होगी, उसी दिन तमाम अन्य लिपियाँ अपनी महत्ता खो बैठेंगी और केवल आदि लिपि का प्रकाश मार्गदर्शन करेगा।
आज हम जब वारङ चिति लिपि का अध्ययन करते हैं, तो केवल अक्षरों का ज्ञान नहीं अर्जित करते, बल्कि अपनी आदि संस्कृति, अपनी पहचान और अपनी जड़ों से भी गहराई से जुड़ते हैं।
इसी कारण से यह लिपि हमारे लिए केवल भाषा का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा और अस्तित्व का आधार है।
