FB IMG 1756000784457 1024x1024

Warang Chiti script is a scientific and spiritual script

Warang Chiti script is a scientific and spiritual script

Warang Chiti script is a scientific and spiritual script वारङ चिति लिपि : ध्वनि और प्रकृति का वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं आध्यात्मिक स्वरूप

मानव सभ्यता में भाषा और लिपि का जन्म सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। परंतु भाषा का बीज केवल समाज की देन नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और ध्वनि के शाश्वत नियमों से जुड़ा हुआ है। इसी परिप्रेक्ष्य में वारङ चिति लिपि को आदि लिपि कहा जाता है। यह लिपि न केवल सामाजिक या साहित्यिक दृष्टि से, बल्कि प्राकृतिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक आधारों पर भी महत्वपूर्ण है।
ध्वनि और स्वर-वर्ण का वैज्ञानिक आधार
“““““““““““““““““
शिशु जब जन्म लेता है तो उसकी वाणी प्रणाली (Vocal System) अभी विकसित अवस्था में होती है।
प्रारंभ में शिशु केवल स्वर ध्वनियाँ निकाल पाता है। ये ध्वनियाँ नाक और गले से स्वतः उत्पन्न होती हैं और इनमें किसी प्रकार का अवरोध नहीं होता।
यही कारण है कि वारङ चिति लिपि में स्वर-वर्ण को नाक से निकलने वाली मूल ध्वनि माना गया है।
ध्वनि-विज्ञान (Phonetics) भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि स्वर ध्वनियाँ वोकल कॉर्ड्स (Vocal Cords) के कंपन और नासिका-गुहा (Nasal Cavity) की गूंज से निकलती हैं। इस दृष्टि से स्वर ध्वनियाँ प्रकृति की आद्य ध्वनि कही जा सकती हैं।
व्यंजन-वर्ण और भाषा का विकास
“““““““““““““““““““`
जैसे-जैसे शिशु बढ़ता है और भाषा सीखने लगता है, वह व्यंजन ध्वनियाँ उच्चारित करने लगता है।
व्यंजन ध्वनियाँ मुख, होंठ, तालु और जीभ की सक्रिय क्रिया से बनती हैं।
इनमें ध्वनि का प्रवाह आंशिक रूप से रोका या मोड़ा जाता है, जिससे ध्वनि में भिन्नता उत्पन्न होती है।
वारङ चिति लिपि इस भेद को स्पष्ट करती है कि स्वर ध्वनियाँ नाक से और व्यंजन ध्वनियाँ मुख से निकलती हैं। यह भाषा-विज्ञान की दृष्टि से एक अत्यंत वैज्ञानिक परिभाषा है।
प्रकृति में लिपि की उपस्थिति
““““““““““““““““`
वारङ चिति लिपि केवल मानव की कल्पना नहीं, बल्कि प्रकृति में भी विद्यमान है। पत्थरों की दरारें, वृक्षों की छाल पर बने पैटर्न, पहाड़ों की सतह पर बने प्राकृतिक रेखाचित्र, इन सबमें अक्षरों जैसी आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। यह इस तथ्य को पुष्ट करता है कि लिपि और भाषा का स्रोत प्रकृति ही है।
आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि प्रकृति में Fractal Patterns, Symmetry और Geometrical Symbols स्वतः निर्मित होते हैं, जो मानव-लिपि से अद्भुत साम्यता रखते हैं।
दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि
““““““““““““““““““
स्वर ध्वनि जीवन की मूल ध्वनि है – यह सहज, प्राकृतिक और शाश्वत है।
व्यंजन ध्वनियाँ ज्ञान और संस्कृति का प्रतीक हैं – यह अभ्यास और संरचना से विकसित होती हैं।
पत्थरों और वृक्षों में अंकित अक्षर यह संकेत देते हैं कि लिपि केवल मनुष्य की देन नहीं, बल्कि ब्रह्माण्ड और प्रकृति का मौलिक चिन्ह है।
“ओङ” को जब ब्रह्माण्डीय ध्वनि कहा जाता है, तो उसका अर्थ यही है कि सम्पूर्ण सृष्टि ध्वनि और तरंगों से बनी है। वारङ चिति लिपि इन्हीं तरंगों का मूर्त रूप है।
वारङ चिति लिपि को सही अर्थों में एक प्राकृतिक, वैज्ञानिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक लिपि कहा जा सकता है। यह शिशु की ध्वनि-यात्रा (स्वर से व्यंजन तक) को समझाती है। यह प्रकृति में पाए जाने वाले आकृतियों और ध्वनियों से जुड़ी है। और यह ब्रह्माण्डीय ध्वनि “ओङ” से सम्पूर्ण सृष्टि का संबंध जोड़ती है।
अतः वारङ चिति लिपि ध्वनि और प्रकृति का वह शाश्वत सेतु है, जहाँ विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म एक साथ मिलते हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
Scroll to Top