shirjan kee dhatu vyutpatti aur vaigyanik siddhant
षिर्जन — सृष्टि का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक अर्थ
सृष्टि, उत्पत्ति या सृजन को हो भाषा में “षिर्जन” कहा जाता है। षिर्जन का अर्थ है — पंचतत्व से रगड़कर, निकलकर, फैलने की क्रिया। षिर्जन = षि + हर्र + जन
जिसका शाब्दिक अर्थ —
षि = हल चलाना, खोज करना, गति आरंभ करना।
हर्र = रगड़ना, घिसना, रक्षा करना, संरक्षित रखना।
जन = फैलना, प्रसारित होना, आगे बढ़ना।
👉 किसी वस्तु को खोजकर, उसकी रक्षा कर, और आगे बढ़ाना ही षिर्जन है।
🪶 वारङ चिति लिपि के अनुसार
“षिर्जन” पाँच अक्षरों से बना है —
ष(षु) + वि:इ + र(हर्र) + ज(विज) + न(नुङ)
अक्षर = अर्थ
ष (षु) = नाव, ध्वनि, जाने का मार्ग, ले जाने वाला
वि:इ = संयम क्रिया, प्राण वायु, अंकुर, उत्पत्ति शक्ति
र (हर्र) = रक्षा करना, सुरक्षित रखना, घर्षण, ऊर्जा
ज (विज) = खुशी, साहस, शक्ति, निर्भयता
न (नुङ) = अण्डा, घूमने वाला, चलायमान, सूक्ष्म तत्व
इसका अर्थ हुआ —
ध्वनि + अंकुर + संरक्षित + शक्ति + गति
अर्थात् — “ध्वनि से उत्पन्न अंकुर को संरक्षित करने की शक्ति जो गति में रहती है” — यही षिर्जन है।
❤️भाषावैज्ञानिक दृष्टिकोण
“षिर्जन” का गठन गहरी ध्वनि और भावनात्मक ऊर्जा से हुआ है।
“षि” खोज और क्रिया का प्रतीक है।
“हर्र” ऊर्जा-संवर्धन और संरक्षण का द्योतक है।
“जन” प्रसार और अभिव्यक्ति का प्रतीक है।
अर्थात्, “खोज → घर्षण → प्रसार” — यही भाषाई सृजन चक्र है।
❤️वैज्ञानिक दृष्टिकोण
वैज्ञानिक रूप से “षिर्जन” ऊर्जा और पदार्थ के रूपांतरण की प्रक्रिया है। जब दो तत्व आपस में घर्षण करते हैं, तब ऊर्जा उत्पन्न होती है। वही ऊर्जा रूपांतरित होकर नया पदार्थ बनाती है। यह बिग बैंग से लेकर परमाणु संलयन तक का मूल सिद्धांत है —
खोज (षि) + ऊर्जा घर्षण (हर्र) + उत्पत्ति (जन) = सृष्टि।
🌏प्रकृति विज्ञान दृष्टिकोण
प्रकृति में “षिर्जन” हर जगह है बीज का अंकुरण, बादल से वर्षा, मिट्टी में जीवन सब सृष्टि के उदाहरण हैं।
षि = खोज
हर्र = घर्षण या ऊर्जा संपर्क
जन = फैलाव या वृद्धि
प्रकृति लगातार “षिर्जन” के चक्र से जीवन को बनाए रखती है।
❤️दार्शनिक दृष्टिकोण
दार्शनिक रूप में “षिर्जन” अस्तित्व की आत्म-चेतना का विस्तार है। जब चेतना स्वयं को पहचानती है, तब “मैं हूँ” की अनुभूति होती है। वह अनुभव ऊर्जा बनता है, और ऊर्जा रूप बन जाती है यही सृष्टि है। “षिर्जन” आत्मा की अपनी उपस्थिति का प्रकट होना है।
🧠आध्यात्मिक दृष्टिकोण
आध्यात्मिक रूप में, “षिर्जन” ध्वनि से उत्पन्न सृष्टि का प्रतीक है। “ष” की ध्वनि ब्रह्मांडीय स्पंदन है वारङषड़ि।
“वि:इ” जीवन का बीज है, “हर्र” रक्षा और नियम, “ज” शक्ति, “न” गति। सृष्टि निरंतर ध्वनि के स्पंदन से घूमती रहती है — यही “षिर्जन” है।
🫀हो भाषा की वैज्ञानिकता
हो भाषा केवल बोलने या पढ़ने की भाषा नहीं है —
बल्कि हर शब्द अपने भीतर वैज्ञानिक अर्थ, दार्शनिक दृष्टि और जीवन का सूत्र रखता है।
हो भाषा के शब्द केवल संवाद नहीं करते, वे सोच को दिशा देते हैं, दिमाग खोलते हैं और नई दृष्टि विकसित करते हैं। इसलिए कहा जाता है — “हो भाषा एक वैज्ञानिक भाषा है, जिसमें प्रत्येक शब्द को सभी दृष्टिकोणों — भाषिक, वैज्ञानिक, प्राकृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक — से परिभाषित किया गया है।”
