Tumul Majja ka vyootpati aur vaigyanik vyakhya
वारङ चिति दर्शन में तुमुल(मज्जा)की वैज्ञानिक व्याख्या
पूर्वजों ने भाषा को केवल बोलने का माध्यम नहीं माना, बल्कि जीवन को समझने की वैज्ञानिक विधि बनाया। तुमुल ऐसा ही एक शब्द है, जिसमें भाषा विज्ञान, जीव विज्ञान, शरीर विज्ञान और दार्शनिक सोच एक साथ समाहित हैं। तुमुल को हिन्दी में मज्जा कहा जाता है, लेकिन इसका अर्थ केवल मज्जा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन की जड़, बीज और आधार का प्रतीक है।
👉 तुमुल का सरल अर्थ
तुमुल = मज्जा
मज्जा वह कोमल तत्व है जो हड्डियों के अंदर होता है और जिससे रक्त, धातु, अंग-प्रत्यंग का निर्माण होता है।
सरल शब्दों में :- तुमुल शरीर का वह मूल बीज है, जिससे पूरा शरीर धीरे-धीरे बनता है।
👉 शब्द-रचना (भाषा विज्ञान का आधार)
तुमुल = तु + मुल
शब्दार्थ
तु = डंक, सूक्ष्म प्रवेश, भीतर तक असर करने वाली शक्ति
मुल = जड़, आधार, नींव, बुनियाद, आरंभ, मौलिक, बीज, तत्व
संयुक्त अर्थ :- वह मूल तत्व जो भीतर छिपा रहता है और शरीर के निर्माण की प्रक्रिया को प्रारंभ करता है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि से यह शब्द मूल (Root word) को दर्शाता है, जैसे किसी भी रचना की शुरुआत एक बीज से होती है।
👉वारङ चिति लिपि में तुमुल
वारङ चिति लिपि में तुमुल पाँच अक्षरों से बना है
ओत + यु: + अम + यु: + ह्लो = तुमुल
अक्षरार्थ (सरल व्याख्या)
त (ओत) = भूमि, पृथ्वी, गर्भाशय
ह्रस्व उकार (यु:) = बूंद, ओस, गिरना, भार
म (अम) = शरीर, संभालना, बंधन
ह्रस्व उकार (यु:) = बूंद, निरंतरता
ल (ह्लो) = लगे रहना, जीवन, शांति, निरंतर कार्य
संयुक्त अक्षरार्थ
गर्भाशय + बूंद + शरीर + बूंद + लगे रहना
गर्भ में बूंद-बूंद करके शरीर बनने की निरंतर प्रक्रिया।
जीव विज्ञान के दृष्टिकोण से तुमुल
(क) मज्जा का कार्य
मज्जा से रक्त कोशिकाएँ बनती हैं
रक्त से धातु (पोवा) बनती है
धातु से अंग-प्रत्यंग विकसित होते हैं
(ख) विकास की क्रमबद्ध प्रक्रिया
१)तुमुल (मज्जा), २)धातु (पोवा), ३)अंग-प्रत्यंग(कोञ्जा/चिति), ४)पूर्ण शरीर(गोटा होमोह)
यह वही सिद्धांत है जिसे आधुनिक जीव विज्ञान क्रमिक विकास (Gradual Development) कहता है।
👉अंग-प्रत्यंग को अक्षर (चिति) क्यों कहते हैं
भाषा विज्ञान के अनुसार :- अक्षर भाषा की सबसे छोटी अर्थपूर्ण इकाई है। अक्षर मिलकर शब्द बनाते हैं
जीव विज्ञान के अनुसार अंग शरीर की सबसे छोटी कार्यशील इकाई है, अंग मिलकर शरीर बनाते हैं
इसलिए कहा गया अंग-प्रत्यंग = अक्षर (चिति)
जैसे बिना अक्षर भाषा अधूरी है, वैसे बिना अंग शरीर अधूरा है।
👉तुमुल से अक्षर (चिति) का संबंध
तुमुल(मज्जा)→धातु(पोवा)→अंग-प्रत्यंग(अक्षर/चिति)
वारङ चिति दर्शन में शरीर को जीवित भाषा माना गया
अंग-प्रत्यंग को उसके अक्षर, तुमुल इस पूरी व्यवस्था का मूल बीज है।
वारङ चिति लिपि और तुमुल:-
यह माना गया है कि वारङ चिति लिपि के 32 अक्षर
इसी तुमुल तत्व से प्रेरित हैं। मज्जा शरीर की नींव है। वैसे ही तुमुल वारङ चिति लिपि की आधारशिला है
👉प्रकृति में “तुमुल” का मूल भाव
प्रकृति में कोई भी रचना अचानक पूर्ण रूप में नहीं बनती।
हर वस्तु पहले बीज, फिर अंकुर, फिर विकास और अंत में पूर्णता तक पहुँचती है। यही प्राकृतिक सिद्धांत तुमुल का आधार है।
तुमुल = बीज + निरंतरता + आंतरिक शक्ति
बीज और मज्जा : प्रकृति का समान नियम
👉वनस्पति जगत:-
बीज मिट्टी (भूमि/गर्भ) में जाता है
नमी (बूंद) पाता है
भीतर से अंकुर फूटता है
धीरे-धीरे पेड़ बनता है
👉जीव जगत:-
बीज/बूंद गर्भाशय में जाता है
भीतर तुमुल (मज्जा-तत्व) सक्रिय होता है
धातु बनती है। अंग-प्रत्यंग विकसित होते हैं
👉 बीज : पेड़ = तुमुल : शरीर
3. पृथ्वी, गर्भ और तुमुल
प्रकृति में:-
पृथ्वी = सबसे बड़ा गर्भ
मिट्टी = पोषण
जल = सक्रियता
ऊष्मा = परिवर्तन
वायु = गति
👉मानव शरीर में:-
गर्भाशय = पृथ्वी
तुमुल = मिट्टी का सार
बूंद = जल
ऊर्जा = ऊष्मा
प्राण = वायु
👉 इससे स्पष्ट होता है कि मानव शरीर प्रकृति की प्रतिकृति है।
👉 बूंद-बूंद का प्राकृतिक नियम
प्रकृति में:-
वर्षा बूंद-बूंद होती है
नदी बूंद-बूंद से बनती है
मिट्टी बूंद-बूंद जीवन पाती है
👉शरीर में:-
गर्भ में बूंद-बूंद विकास, मज्जा से धातु का निर्माण,
धातु से अंग-प्रत्यंग, यह वही सिद्धांत है जो तुमुल के अक्षरार्थ में कहा गया है “लगे रहना, लगातार बनते रहना”
👉प्रकृति में धातु और तुमुल
प्रकृति में धातुएँ:-
पहले सूक्ष्म अवस्था में होती हैं! ऊष्मा, जल और समय से
ठोस रूप लेती हैं
शरीर में :- तुमुल से धातु बनती है धातु से अंग बनते हैं
अंग से जीवन क्रिया चलती है
👉 प्रकृति और शरीर का नियम एक ही है।
अंग-प्रत्यंग = प्रकृति के अक्षर
जैसे पत्तियाँ पेड़ के अक्षर हैं, शाखाएँ वाक्य हैं, पूरा पेड़ ग्रंथ है
