Bindiram ka goon aur vaigyanik vyakhya
🖊️हो भाषा में बिंदीरम (मकड़ी) प्रकृति-प्रदत्त पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान का जीवंत प्रमाण
❤️हो भाषा में मकड़ी को “बिंदीरम” कहा जाता है। बिंदीरम केवल एक कीट या जीव नहीं है, बल्कि यह हो समाज की भाषिक चेतना, प्राकृतिक बोध, वैज्ञानिक दृष्टि, सामाजिक मर्यादा और सांस्कृतिक स्मृति का प्रतिनिधि है।
हो समाज का पारंपरिक ज्ञान प्रकृति से निरंतर संवाद का परिणाम है, और बिंदीरम इसका सशक्त उदाहरण है।
❤️भाषिक संरचना एवं शब्द-विवेचन (वारङ चिति लिपि के अनुसार)
बिंदीरम शब्द वारङ चिति लिपि में आठ अक्षरों से बना है
बुउ + वि:इ + ङ्: + द: + वि:इ + ई + हर + अम = बिंदीरम
अक्षरार्थ
ब (बुउ) – ढंकना, छिपाना, अर्जित करना, घुसना, गोल संरचना
वि:इ (ह्रस्व इकार) – संयम क्रिया, श्वास, प्राणवायु, केन्द्र, उत्पत्ति शक्ति
ङ्: (अनुस्वार) – प्रकाश, प्रभा, ऊर्जा, चमक
द (द:) – जल, पानी, संगम
वि:इ (ह्रस्व इकार) – जीवन-शक्ति, संतुलन
ई (इ) – जीव, जन्तु, आयु, उत्पत्ति
र (हर) – रक्षा करना, सुरक्षित रखना
म (अम) – शरीर, संभालना, रोकना, बंधन
संयुक्त अर्थ :- अर्जित + प्राणवायु + प्रकाश + जल + जीव + रक्षा + बंधन
👉 बिंदीरम वह है जो जीवन की रक्षा हेतु प्राणवायु, प्रकाश और जल को संयमित कर संरचना (जाल) के रूप में बुनता है।
❤️प्राकृतिक दृष्टिकोण :- प्रकृति में मकड़ी एक सूक्ष्म किंतु अत्यंत कुशल जीव है। वह अपने शरीर से निकले तंतु से जाल बुनती है। हवा, प्रकाश और नमी के अनुसार जाल का स्थान चुनती है न्यूनतम संसाधन में अधिकतम सुरक्षा सुनिश्चित करती है। यह दर्शाता है कि बिंदीरम प्राकृतिक संरचना और संरक्षण का आदर्श मॉडल है।
❤️वैज्ञानिक दृष्टिकोण आधुनिक विज्ञान के अनुसार :-
मकड़ी का जाल वजन के अनुपात में स्टील से अधिक मजबूत होता है यह ऊर्जा-संरक्षण और जैव-इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है। कीट नियंत्रण द्वारा पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखता है। इससे स्पष्ट होता है कि हो समाज का पारंपरिक ज्ञान वैज्ञानिक चेतना से युक्त रहा है।
❤️सामाजिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण (मगे पोरोब कथा)
हो समाज की मगे पोरोब कथा के अनुसार मागे पर्व के चौथे दिन “हे: सकम” के अवसर पर दनसरि बोंगा (देव)
आदि माता-पिता लुकु और लुकुमि के पास बिंदीरम के रूप में आए। बिंदीरम ने कपड़ा बुनना सिखाया
वस्त्र पहनने की परंपरा दी, शरीर ढंकने की मर्यादा और संस्कार स्थापित किया। इसी दिन साल का पत्ता उड़कर लुकु के गुप्त अंग को ढकता है। सियाली का पत्ता लुकुमि के उसी अंग को ढकता है यह कथा वस्त्र-संस्कृति, लज्जा-बोध और सामाजिक मर्यादा की उत्पत्ति को दर्शाती है।
❤️दार्शनिक एवं सांस्कृतिक प्रतीक :- बिंदीरम नग्नता से सभ्यता की ओर यात्रा का प्रतीक है संयम, संरचना और सुरक्षा का बोध कराता है प्रकृति से सीखकर जीवन जीने की प्रेरणा देता है यह दर्शाता है कि हो समाज में ज्ञान अनुभव से उत्पन्न होता है, आदेश से नहीं।
❤️पारंपरिक ज्ञान : प्रकृति का प्रत्यक्ष देन :- इन सभी भाषिक, प्राकृतिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि हमारे पास जो पारंपरिक ज्ञान है, वह प्रकृति की देन है। हो समाज ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि गुरु और मार्गदर्शक माना।
जंगल, जीव, पत्ते, जल, प्रकाश और प्राणवायु,
यही हमारी पहली पाठशाला रही है। इसलिए यह कहना पूर्णतः उचित है कि पारंपरिक ज्ञान मानव की नहीं, प्रकृति की खोज है।
