Ho samaj Deshauli ka vaigyanik vyakhya
आज हम वैज्ञानिक एवं तकनीकी युग में जी रहे हैं। इस युग में वास्तविकता से मुँह मोड़कर नहीं जिया जा सकता। आज के समय में वही समाज सभ्य माना जाता है, जो प्राकृतिक नियमों और वैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुरूप जीवन व्यतीत करता है।
जब सवाल उठते हैं, तो उनके उत्तर देना अनिवार्य हो जाता है। विज्ञान यह कहता है कि जिस वस्तु को तर्क, अनुभव और प्रमाण से नहीं समझा जा सकता, उसे सत्य मानना कठिन है। यही कारण है कि आज आदिवासी समाज की प्रकृतिपूजा पर भी प्रश्न खड़े किए जाते हैं।
हम स्वयं कहते हैं कि हम प्राकृतिक पूजक हैं, लेकिन जब हमसे पूछा जाता है, देषौलि क्या है? देषौलि कैसा दिखता है? देषौलि क्या कार्य करता है? देषौलि हमें क्या देता है? देषौलि हमें क्या सिखाता है? देषौलि के नाम पर लाल मुर्गे की पूजा क्यों होती है? देषौलि का नामकरण कैसे हुआ? तो अक्सर हम इन प्रश्नों का तर्कपूर्ण और स्पष्ट उत्तर नहीं दे पाते। इसी कारण आज आवश्यकता है कि देषौलि को आस्था के साथ-साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी समझा जाए। आइए, कोल–हो आदिवासियों के देषौलि के वैज्ञानिक दर्शन को समझने का प्रयास करें।
❤️देषौलि क्या है?
कोल हो समाज में देषौलि एक पवित्र स्थल है। यह वह स्थान है जहाँ पोरोब पोनइ एवं विशेष अवसरों पर दियुरी द्वारा पूजा की जाती है।
देषौलि देखने में सामान्य जंगल या वन क्षेत्र जैसा प्रतीत होता है, जहाँ पेड़-पौधे और प्राकृतिक वातावरण होता है।
❤️ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देषौलि :- हो समाज के इतिहास को देखने पर यह स्पष्ट होता है कि जब भी नया गाँव बसाया जाता है, तो घर बनाने से पहले
खेती योग्य भूमि तैयार करने से पहले
सबसे पहले उस स्थान पर देषौलि की स्थापना और दियुरि द्वारा पुजा की जाती है। मान्यता है कि यदि देषौलि की पूजा किए बिना गाँव बसाया जाए, तो उस स्थान पर मनुष्य सुरक्षित नहीं रह सकता। ऐसी स्थिति में शेर, भालू, साँप, बिच्छू जैसे जंगली जीवों से हानि होने की आशंका रहती है। इसी कारण हर गाँव में देषौलि की स्थापना अनिवार्य रूप से की जाती है। गांव में दियूरि वही बनता है जो खूंटकट्टी है।
देषौलि एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच देषौलि को केवल धार्मिक स्थल नहीं, परंतु एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच माना जाता है। जब गाँव में महामारी फैलती है, अज्ञात बीमारी आती है तो देषौलि की पूजा की जाती है।
मान्यता है कि इससे बीमारी के प्रसार पर नियंत्रण होता है और गाँव की सामूहिक ऊर्जा संतुलित रहती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो देषौलि के आसपास का स्वच्छ, वनयुक्त वातावरण, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
❤️भाषिक दृष्टिकोण से देषौलि
देषौलि शब्द दो भागों से मिलकर बना है
🖊️दे + षौलि = देषौलि
शब्दार्थ :- दे = माँगना, षौलि = चुनौती
👉 संयुक्त अर्थ :- चुनौती माँगने वाला, अर्थात प्रकृति से संघर्ष कर संतुलन बनाए रखने की चेतना।
❤️वैकल्पिक शब्दार्थ:- देष = देश, दिशुम, दुनिया
उलि = आत्मा, सृष्टि
👉 संयुक्त अर्थ :- दुनिया में जीवन तभी संभव है, जब उसमें आत्मा और प्राण शक्ति हो।
❤️धार्मिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण:- धार्मिक दृष्टि से देषौलि एक देवता है, जो धनात्मक ऊर्जा का स्रोत है
प्रकृति में हवा के रूप में विद्यमान है
शरीर में साँस (प्राण वायु) के रूप में कार्य करता है
देषौलि का रंग लाल माना गया है। इसी कारण देषौलि के नाम पर लाल मुर्गे की पूजा की जाती है।
हो भाषा के रंग-विज्ञान के अनुसार:- हवा का रंग लाल माना जाता है, जो ऊर्जा और जीवन का प्रतीक है।
❤️वारङ चिति लिपि में देषौलि
हो भाषा की वारङ चिति लिपि में देषौलि 6 अक्षरों से बना है
द:+अ:ए + षू + उ + ह्लो + वि:इ = देषौलि
अक्षरार्थ
(द:) — जल, संगम, द्वीप, सात महाद्वीप
(अ:ए) — सृष्टि, उत्पत्ति, जन्म, योनि
(षू) — ध्वनि, नाव, मार्ग, ले जाने वाला
(उ) — समूह, समाज, वन, समुद्र
(ह्लो) — शांति, जीवन, निरंतर कर्म
(वि:इ) — साँस, प्राण वायु, संयम, जीवन शक्ति
इन प्रत्येक अक्षरों का अर्थों को एक एक निकालेंगे।
महाद्वीप+सृष्टि+ध्वनि+समूह+निरंतर+प्राण वायु
👉 संयुक्त भावार्थ :- महाद्वीप में सृष्टि की उत्पत्ति के बाद, ध्वनि और ऊर्जा के माध्यम से जीवन को निरंतर प्राण वायु प्रदान करने वाली शक्ति ही देषौलि है।
❤️लोककथा और वैज्ञानिक संकेत:- लोककथाओं के अनुसार, मरं पोरोब के छठे दिन, देषौलि लाल घोड़े पर सवार होकर लुकु–लुकुमि के पास आए और उन्हें स्वर-विज्ञान का ज्ञान दिया। यह संयोग नहीं है कि देषौलि शब्द 6 अक्षरों का है
मरं पोरोब का यह दिन भी छठा दिन है
लाल घोड़ा भी इच: फूल (लाल फूल) से सजा हुआ था, जो ऊर्जा और ताप का प्रतीक है।
❤️देषौलि द्वारा दिया गया व्यावहारिक ज्ञान:- देषौलि ने जीवन से जुड़े अनेक वैज्ञानिक और व्यवहारिक ज्ञान दिए, जैसे शरीर ठंडा होने पर कैसे सोने से शरीर गर्म होता है! अत्यधिक गर्म शरीर को कैसे ठंडा किया जाए
स्नान करते समय नाक से किस साइड से साँस छोड़नी चाहिए यह ज्ञान आज भी पुजारी (दियुरी) जानते हैं और व्यवहार में लाते हैं।
यदि हम देषौलि को सही संदर्भ, सही भाषा और सही तर्क के साथ प्रस्तुत करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि आदिवासी दर्शन अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति आधारित वैज्ञानिक जीवन प्रणाली है।
