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Chara didi prakriti ke saphaikarmee

Chara didi prakriti ke saphaikarmee

चड़ा दिदि प्रकृति के सफाईकर्मी
कुछ साल पहले गाँवों के आसमान में गिद्धों (दिदि) का बड़ा झुंड उड़ता हुआ दिखाई देता था।
गिद्ध साधारण पक्षी नहीं थे, बल्कि उन्हें लोग प्रकृति का पुजारी और गाँव का सफाईकर्मी मानते थे।
गाँव में जब भी कोई पशु—गाय, भैंस, बकरी, कुत्ता या बिल्ली मर जाती, लोग उसकी लाश को गाँव की सीमा पर फेंक आते।
यह परंपरा थी, क्योंकि सबको मालूम था कि गिद्ध आकर उसे खा जाएंगे और गाँव को बीमारियों से बचा लेंगे।
गिद्धों का हमेशा एक समूह होता था। उस समूह का एक मुखिया रहता था, जिसे लोग दियुरि या सोना दिदि कहते थे।
सोना दिदि सबसे पहले लाश के पास आता, वहाँ एक छोटी-सी पूजा करता और फिर मांस खाना शुरू करता।
उसके बाद पूरा झुंड भोजन में शामिल होता।
लोग मानते थे कि यदि मुंडी (सिर) दक्षिण दिशा में नहीं होगा, तो गिद्ध उस पशु को नहीं खाएँगे।
इसलिए जब भी लोग मृत पशु को सीमा पर रखते, तो उसका सिर दक्षिण की ओर घुमा देते।
गिद्ध मृत पशु को खाते-खाते पूरा साफ कर देते।
न लाश सड़ती, न दुर्गंध फैलती, और न ही बीमारियाँ।
गिद्धों की यही सेवा प्रकृति का संतुलन बनाए रखती थी।
गाँव के बुजुर्ग कहते थे कि—
अगर गिद्ध कभी किसी इंसान को हग दिया तो वो व्यक्ति में बंगरा बीमारी पड़ जाता है।
इससे मुक्ति पाने के लिए इंसान को सात गाँव से चावल माँगकर लाना पड़ता और फिर पूजा करनी पड़ती।
तभी वह ठीक होता।
कहा जाता है कि गिद्ध मरे हुए पशु को ढूँढने का अपना तरीका रखते थे। जहाँ लाश पड़ी होती, वहाँ चींटियाँ आग जलातीं और धुआँ उठता।
गिद्ध उस धुएँ को देखकर दूर आसमान से वहाँ पहुँच जाते।
सबसे रोचक बात यह थी कि जब गिद्ध पेट भरकर खा लेते, तो वे नाचने और जश्न मनाने लगते।
मानो बता रहे हों—“हमने अपना काम पूरा किया, अब प्रकृति सुरक्षित है।”
गाँव के लोग इसे शुभ मानते और खुश होते।
लेकिन धीरे-धीरे समय बदल गया।
इंसान लालची और मूर्ख हो गया।
मरे हुए पशुओं में जहर डाला गया, खेतों में रसायन और रेडिएशन फैल गया।
पशुओं को दी जाने वाली दवा डाइक्लोफेनाक गिद्धों के लिए ज़हर साबित हुई।
गिद्ध एक-एक कर मरने लगे।
आज हाल यह है कि पहले जहाँ आसमान गिद्धों से भरा रहता था, अब उन्हें देखना मुश्किल हो गया है।
गिद्ध लगभग गायब हो चुके हैं।
और जब से गिद्ध घटे हैं, गाँव में मृत पशु सड़ने लगे हैं, बीमारियाँ फैलने लगी हैं और पर्यावरण असंतुलित होने लगा है।
गिद्धों की हड्डियाँ कभी औषधियों में काम आती थीं, पर अब उनकी प्रजाति ही संकट में है।
सरकार संरक्षण के प्रयास कर रही है, पर असली जिम्मेदारी हमारी है।
सोना दिदि और उसका झुंड आज हमें याद दिलाता है—
कि यदि गिद्ध नहीं होंगे तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाएगा।
हमें उन्हें बचाना ही होगा, क्योंकि गिद्ध केवल पक्षी नहीं, बल्कि धरती के सफाईकर्मी और जीवन रक्षक हैं।

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