Ho Aadivasi samuday ek parichay
Ho Aadivasi samuday हो साहित्य के बारे में बात करने से पहले मैं आप सभी को अपना परिचय देना चाहूंगा। मेरा नाम रबिन्द्र गिलुवा है, मैं चक्रधरपुर, झारखंड से हैं। मैं हो आदिवासी समुदाय से आता हूँ और अर्थशास्त्र में स्नातकोतर किया है। समाज सेवा के प्रति मेरी गहरी रुचि है, और मैं डोनेट ब्लड’ वेबसाइट का संस्थापक हैं। आदिवासी संस्कृति और इतिहास पर शोध करना मेरा प्रमुख उद्देश्य है, जिससे हमारी विरासत को संरक्षित और प्रचारित किया जा सके। इसके अलावा, मैं आदिवासी मित्र मंडल चक्रधरपुर’ का युवा सचिव हूँ और कई अन्य संगठनों से भी जुड़ा हूँ।
अब यदि हम झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र की बात करें, तो यह पृथ्वी के सबसे पुराने भूभागों में से एक हो सकता है।
दैनिक भास्कर के 12 दिसंबर 2021 के अंक में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सिंहभूम क्षेत्र लगभग 3.2 अरब साल पहले समुद्र से बाहर आया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के भूभागों से भी 20 करोड़ साल पुराना है। इस खोज की पुष्टि के लिए छह महीने तक गहन अध्ययन किया गया, जिसमें सिंहभूम क्रेटन में प्राचीन नदी और तटीय संरचनाओं के प्रमाण मिले।
इस अध्ययन के अनुसार, यह क्षेत्र कभी समुद्र में डूबा हुआ था और धीरे-धीरे इसका उद्भव हुआ। सिंहभूम क्रेटन को पृथ्वी के सबसे पुराने और स्थिर भूभागों में से एक माना जाता है, जहाँ की चट्टानों की उम्र 3.6 से 3.2 अरब साल के बीच आंकी गई है। इस खोज से यह भी स्पष्ट होता है कि जब यह क्षेत्र समुद्र से बाहर आया, तब यहाँ जीवन के शुरुआती रूप विकसित होने लगे होंगे। इसका प्रमाणिकता आप को चक्रधरपुर शहर के अंतर्गत नकटी के बरंडिया में झारखण्ड सरकार द्वारा लिखे गए शिलान्यास पर मिलेंगे। जहाँ लिखा हुआ है यह पत्थर 280 करोड़ से भी अधिक पुराना है।
इस महत्वपूर्ण खोज ने सिंहभूम क्षेत्र को “विश्व की मातृभूमि” के रूप में प्रस्तुत किया है, क्योंकि यह पृथ्वी का पहला महाद्वीपीय भूभाग था। झारखंड और पूरे भारत के लिए यह गर्व की बात है कि हमारा क्षेत्र पृथ्वी की उत्पत्ति और विकास के इतिहास में इतना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह अध्ययन न केवल हमारे राज्य की ऐतिहासिक और भौगोलिक महत्ता को दर्शाता है, बल्कि हमारी समृद्ध प्राकृतिक धरोहर को भी उजागर करता है।
हो आदिवासी समुदायः एक संक्षिप्त परिचय:
हो (Ho) आदिवासी समुदाय भारत के झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ राज्यों में निवास करता है। यह विशेष रूप से झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां और पड़ोसी क्षेत्रों में अधिक संख्या में पाया जाता है। भारत में हो आदिवासी समुदाय की जनसंख्या लगभग 15-18 लाख के बीच है। यह आंकड़ा 2011 की जनगणना के आधार पर अनुमानित है।
भाषा:
हो समुदाय की मातृभाषा हो (Ho) है, जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार की मुंडारी शाखा से संबंधित है। इसे वारंग क्षिति लिपि में लिखा जाता है, जिसे लाको बोदरा ने 1940 ई० में विकसित किया था। दिलचस्प बात यह है कि इस लिपि की जड़ें 13वीं शताब्दी तक जाती हैं, जब देयोंवा तुरी ने इसकी खोज की थी। लाको बोदरा ने इसे न केवल संरक्षित किया बल्कि इसे एक सशक्त लिखित रूप भी दिया।
संस्कृति और परंपराएँ:
हो समुदाय की संस्कृति प्रकृति से गहराई से जुड़ी हुई है। उनके पारंपरिक त्योहारों में मागे पोरोब, बाः पोरोब, बाबा हेर मुट प्रमुख हैं। ये त्योहार फसलों की कटाई, प्रकृति पूजा और सामुदायिक उत्सवों से जुड़े होते हैं। इन त्योहारों में पूरे गांव के लोग एक साथ मिलकर नाचते-गाते हैं, जिससे उनका सामूहिक भाव और भी मजबूत होता है। हो आदिवासी लोग अपने हर पूजा पाठ में डियेंग (हड़िया) का उपयोग करते हैं।
आर्थिक जीवनः
हो आदिवासी समुदाय का पारंपरिक पेशा कृषि और वनों पर निर्भरता है। इसके अलावा, कुछ लोग पशुपालन, कारीगरी और अन्य पारंपरिक व्यवसायों में भी संलग्न होते हैं। आधुनिक समय में शिक्षा और सरकारी योजनाओं के चलते यह समुदाय सरकारी और निजी क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बना रहा है।
सामाजिक संरचनाः
हो समाज पितृसत्तात्मक और कबीलाई प्रणाली पर आधारित है। यहाँ पारंपरिक मानकी-मुंडा स्वशासन व्यवस्था प्रचलित है, जिसमें ग्राम प्रधान (मुंडा) और ग्राम सभा सर्वोच्च न्यायालय के रूप में कार्य करते हैं।
धार्मिक विश्वासः
हो समुदाय के लोग प्रकृति पूजक होते हैं और सिंगबोंगा (सूर्य देवता/कुल देवता) को अपना मुख्य देवता मानते हैं। इनके धार्मिक विश्वासों में पेड़, नदियों, पहाड़ और अन्य प्राकृतिक तत्वों की पूजा शामिल है। एक दिलचस्प मान्यता यह भी है कि आत्मा कभी नहीं मरती। वे अपने पूर्वजों की आत्माओं को अदिंग (घर के अंदर स्थित पूजा स्थल) में रखते हैं, जहाँ घर के सदस्यों के अलावा किसी बाहरी व्यक्ति का जाना वर्जित होता है। हो आदिवासी लोग जब रुवा किया अदेर (आत्मा को घर बुलाना) करते हैं तो घर के अंदर किसी भी जीव जंतु का पद चिह्न बनता है, जिससे पता चलता है कि उन्हें किस रूप में जन्म मिला है। यह प्रक्रिया करते समय एक बुजुर्ग महिला घर के अंदर होती है। जब आत्मा घर आती है तो उन्हें महसूस होता है, उनका रोंगटा खड़ा हो जाता है। ये चीज घर वाले जो आत्मा बुला रहे होते हैं उन्हें भी एहसास होता है।
समकालीन स्थितिः
आज भी हो समुदाय अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। हालांकि, आधुनिक शिक्षा, सरकारी योजनाओं और जागरूकता अभियानों के प्रभाव से यह समुदाय धीरे-धीरे मुख्यधारा की ओर बढ़ रहा है।
यह समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान, समृद्ध भाषा और सांस्कृतिक विरासत के कारण भारतीय जनजातीय समाज में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
मौखिक परंपराएं
मौखिक परंपराएं: हो आदिवासी समाज का ज्ञान और विज्ञान
हो आदिवासी समुदाय में जान और परंपराओं का एक समृद्ध भंडार मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होता आया है। यह परंपराएँ प्रकृति के गहरे अवलोकन, कृषि संबंधी ज्ञान, सामाजिक व्यवस्थाओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर आधारित होती हैं।
प्रकृति और मौसम का ज्ञान
हो समुदाय के पूर्वजों ने पक्षियों, पेड़ों और अन्य प्राकृतिक संकेतों से मौसम के पूर्वानुमान की परंपरा विकसित की है। उदाहरण के लिए:
जिस वर्ष पक्षी पेड़ों की ऊपरी शाखाओं में घोंसला बनाते हैं, उस वर्ष बारिश देर से होती है या सूखे की संभावना रहती है।
वहीं, यदि पक्षी पेड़ की मध्य या निचली शाखाओं में घोंसला बनाते हैं, तो यह संकेत होता है कि बारिश समय से पहले होगी और अच्छी वर्षा होगी।
विवाह और पारंपरिक रीति-रिवाज
हो आदिवासी समाज में विवाह और जागेन (दिरी दुल सुनुम) का आयोजन मुख्य रूप से फरवरी से मई के बीच किया जाता है। इस समयः
कृषि का कार्य समाप्त हो चुका होता है, जिससे लोगों के पास उत्सव मनाने का पर्याप्त समय होता है।
वृक्षों पर नए पत्ते आ जाते हैं, जिन्हें पत्तल बनाने, मंडप सजाने, तथा जमडा (मेहमानों के ठहरने के लिए अस्थायी ढांचा) तैयार करने में उपयोग किया जाता है।
अंतिम संस्कार और दफनाने की परंपरा
हो समुदाय में मृत शरीर को उत्तर दिशा की ओर पैर करके दफनाया जाता है। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैं:
1. ऐतिहासिक रूप से हो समुदाय उत्तर दिशा से आकर कोल्हान क्षेत्र (पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला-खरसावा) में बसा था।
2. यह परंपरा भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक संकेत के रूप में कार्य करती है, जिससे यह पता चलता है कि उनके पूर्वज यहाँ निवास करते थे। यह हमारी वंशावली और ऐतिहासिक पहचान को सुरक्षित रखने का एक माध्यम है।
खाद्य संरक्षण की पारंपरिक विधियाँ
हो समुदाय में भोजन और कृषि उत्पादों को संरक्षित करने की अनूठी परंपराएँ हैं:
साग-सब्जियों का संरक्षणः नीम, मुनगा (सहजन), चाकोड़, सारू (अरबी) आदि सागों को इकट्ठा कर सुखाया जाता है और सुरक्षित स्थानों पर रखा जाता है ताकि इन्हें गैर-मौसमी समय में उपयोग किया जा सके।
मछली संरक्षणः मछली को सुखाकर लंबे समय तक संरक्षित रखा जाता है, ताकि आवश्यकता पड़ने पर इसका उपयोग किया जा सके।
बीजों का संरक्षणः बीजों को विशेष रूप से पत्तों में लपेटकर या ‘बांदी’ (हो शब्द जिसमें बसा की बड़ी रस्सी बनाकर बीजों को उसमें लपेटा जाता है) के माध्यम से संग्रहित किया जाता है, जिससे अगली फसल के लिए बीज सुरक्षित रहते हैं।
पारंपरिक नृत्य और विज्ञान
हो आदिवासी समुदाय के प्रत्येक पर्व और अनुष्ठान से संबंधित विशिष्ट गीत और नृत्य होते हैं। इन नृत्यों की दिशा हमेशा दाएँ से बाएँ (Right to Left) होती है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं:
पृथ्वी अपनी धूरी पर पश्चिम से पूर्व दिशा में घूमती है। यदि कोई वस्तु इसकी गति के विपरीत जाती है, तो वह जल्दी धीमी पड़ जाती है। इसलिए, धावकों के लिए बनाए गए रनिंग ट्रैक भी दाएँ से बाएँ दिशा में होते हैं।
मानव शरीर की संरचना भी इसी के अनुकूल है। दौड़ते समय शरीर का संतुलन बाएँ पैर पर अधिक होता है, जिससे गति प्राप्त करने में सहायता मिलती है।
खेत में हल जोतने का कार्य भी इसी दिशा में किया जाता है।
चंद्रमा भी पृथ्वी के चारों ओर दाएँ से बाएँ घूमता है, और लगभग सभी ग्रह सूर्य की परिक्रमा इसी दिशा में
करते हैं।
यहाँ तक कि परमाणु में इलेक्ट्रॉन्स भी अपने नाभिक के चारों ओर दाएँ से बाएँ घूमते हैं।
हो आदिवासी समाज का मौखिक ज्ञान केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके प्राकृतिक संकेतों से मौसम का पूर्वानुमान, खाद्य संरक्षण की तकनीकें, और पारंपरिक रीति-रिवाजों में छिपे वैज्ञानिक रहस्य इस समुदाय की बौद्धिक संपदा को दर्शाते हैं। इस मौखिक ज्ञान को संरक्षित करना न केवल हो समाज के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए महत्वपूर्ण है।
लिखित साहित्य
आप सभी को जानकारी देना चाहेंगे कि हम जिस कोल्हान की बात कर रहें हैं। ऐसा कहा जाता है कि कोल्हान (वर्तमान में झारखंड के तीन जिले- पूर्वी सिंहभूम, पश्चिम सिंहभूम और सरायकेला-खरसावां कोल्हान प्रमंडल कहलाते हैं।) के लोग कभी किसी मुगलों, मराठों और अंग्रेज़ों के गुलाम नहीं रहे हैं। ऐसे इसलिए क्योंकि कई बड़े योद्धा इस पवित्र भूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिए।
1820-21 (हो विद्रोह) में तत्कालीन राजा जगन्नाथ सिंह अंग्रेजों से मिल कर “हो” आदिवासी लोगों पर राज करना चाह रहें। 25 मार्च 1820 कोल्हान के वीरों ने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह छेड़ा। अंग्रेजी हुकूमत की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध आदिवासियों ने चाईबासा पुलिस लाइन स्थित ब्रिटिश कैंप का घेराव किया। घबराए मेजर रफसेज ने गोली चलाने का आदेश दिया, और 40-50 वीर शहीद हो गए। लेकिन उनकी आंखों में विजय की चमक थी उनका बलिदान स्वतंत्रता की मशाल बन गया। इस बीच बहुत सारे युद्ध हुए लेकिन 1821 में दो महीने लम्बी लड़ाई हुई। अंग्रेज फिर भी जीत नहीं पाई, तब अंग्रेज लोग अलग अलग चाल चलने लगे। हो लोगों के साथ संधि करने की सोची पर कहाँ हो लोगो राजा या ठेकेदार को आठ आना (50 पैसे) प्रति हल देने वाले थे। यह युद्ध/विद्रोह आगे जा कर 1831-32 ई में कोल विद्रोह का रूप लिया। अंग्रेजों का अत्याचार इतना बढ़ गया था की हो लोगों से शक्ति से कर वसूल कर रहे थे और तो और घर के बहू बेटियों की इज्जत भी लूटी जा रही थी। 1831 में मानकी सिंदराय, बिन्दराय एवं सुर्गा मानकी द्वारा आंदोलन को जोर दिया गया।
यह कोल विद्रोह इतना फैल गया कि कोल्हान के अलावा रांची, टोरी, हजारीबाग इत्यादि जगह में भी होने लगा। अब छापामार और गुरिल्ला युद्ध कर आदिवासी अंग्रेज़ों और जमींदारों पर भारी पड़ने लगे थे। कोल विद्रोह को लकड़ा विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है। सिलागाई, चान्हो, रांची इत्यादि तरफ अब बुधू भगत, जोआ भगत और उनके साथी लोग नेतृत्व कर रहे थे, इस विद्रोह में अंग्रेज़ों के बहत नुकसान हो रहा था। इसलिए अंग्रेज़ों द्वारा 18 जनवरी 1833 सरायकेला में एक हिल असेम्बली बुलाई गई, फिर से हो लोगों और अंग्रेजों के बीच समझौता हुआ, इस बार बंगाल अधिनियम पारित किया गया और छोटानागपुर क्षेत्र को विनियमन मुक्त क्षेत्र घोषित किया गया। इस युद्ध का परिणाम यह हुआ कि 1837 में ही कोल्हान को कोल राज्य घोषित किया गया। इसी युद्ध के वजह से और यहाँ के आदिवासियों के विरोध को देखते हुए ही कोल्हान में स्वशासन व्यवस्था को बनाए रखने के लिए विल्किंसन रूल लागू किया गया। 06 अक्टूबर 1937 को, भारत की आज़ादी से दस वर्ष पूर्व, तत्कालीन बिहार-उड़ीसा के राज्यपाल सर मॉरिस गार्नियर हैलेट ने इस शहीद स्मारक का उद्घाटन किया। यह मात्र एक स्मारक नहीं था, बल्कि एक संदेश था- एक चिंगारी थी, जो आने वाले स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति की ज्वाला को और अधिक प्रज्वलित करने वाली थी।
अब बात करते हैं उलगुलान के महानायक धरती आबा बिरसा मुंडा की। बिरसा मुंडा जी की जन्म भी कोल्हान के पवित्र भूमि में ही 15 नवंबर 1875 में उत्लीहातु (वर्तमान खूंटी जिला) में हुआ था। उनकी शिक्षा कोल्हान के मुख्यालय चाईबासा में ही हुई थी। बिरसा मुंडा की उलगुलान 1895-1900 तक चली थी। इस बीच उन्होंने अंग्रेजों के नाम में दम कर रखा था। बिरसा मुंडा जी एक अध्यात्मिक एवं वैयिक भी थे वे लोगों की दुःख तकलीफ सुनते थे और उन सभी की समस्याओं का निवारण करते थे, जिस वजह से उन्हें प्यार से ‘धरती आबा का उपाधि मिला और लोग धरती आबा कहा करके ही पुकारने लगे।
1899-1900 में बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी हकूमत के खिलाफ खुला विद्रोह किया और शोषणकारी नीतियों को चुनौती दी। उन्होंने आदिवासियों को संगठित किया और अन्याय के खिलाफ संघर्ष छेड़ा। 1899 में उनके अनुयायियों ने अंग्रेजों की पुलिस चौकियों, चर्चों और सरकारी संस्थानों पर हमले किए, जिससे ब्रिटिश प्रशासन में हलचल मच गई। 9 जनवरी 1900 को बिरसा अपने साथियों के साथ डोम्बारी बरु (पहाड़) पर अंग्रेजों से भिड़े। इस संघर्ष में कई आदिवासी शहीद हुए, लेकिन बिरसा मुंडा का साहस और विद्रोह की भावना अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासी प्रतिरोध का प्रतीक बन गई।
बिरसा मुंडा को 3 फरवरी 1900 में चक्रधरपुर के जंगल से पकड़ा गया और 9 जून 1900 को राँची जेल में जहर दे कर मार डाला गया।
25 दिसंबर 1947, गुरुवार का दिन ही जोजोडीह गाँव में नदी किनारे एक आम सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा में सभी समाजसेवी आंदोलनकारी आदिवासियों ने तय किया कि कोल्हान रियासत को ओडिशा में शामिल नहीं होने देंगे यह अलग राज्य झारखंड के रूप में बने। वहीं दूसरी तरफ सरायकेला खरसावां के राजाओं ने इसे ओडिशा राज्य में शामिल होने के लिए अपनी सहमति दे दी थी। कोल्हान के आदिवासी खुद को स्वतंत्र राज्य के रूप में अपने पहचान कायम रखने के लिए एकजुट होने लगे थे। सभी के सहमति से गुरुवार हाट खरसावां में, 1 जनवरी 1948 के दिन सभा आयोजन करने का फैसला लिया गया। इस सभा को जयपाल सिंह मुंडा संबोधित करने वाले थे। जयपाल सिंह मुंडा को देखने और सुनने के लिए 2-3 दिन पहले से ही चक्रधरपुर, चाईबासा, जमशेदपुर, सरायकेला, खरसांवा, रांची, खूंटी, गुमला, तमाड़ तथा आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से युवा, बच्चे, बूढ़े, नौजवान और महिलाएं पैदल ही गुरुवार हाट सभा स्थल की ओर आने लगे थे, वे अपने साथ सिर और कंधे पर लकड़ी के गठरी, चावल, खाना बनाने वाला बर्तन, तथा रात को रुकने का व्यवस्था इत्यादि लेकर आए थे। राशन पानी के अलावा वे अपने साथ पारंपरिक हथियार और तीर धनुष भी लाये थे। रास्ते भर सारे लोग अलग राज्य के लिए और ओडिशा में विलय के खिलाफ नारा लगाते आ रहे थे। इधर केंद्र सरकार और ओडिशा सरकार ने षड्यंत्र रचते हए चुपके से सैकड़ों पुलिसवालों को खरसांवा भेज दिया था, ओडिशा पुलिस के लोग चुपचाप अंधेरे में ही खरसावां के मिडिल स्कूल में जमा होने लगे थे। इस बात से आंदोलनकारी बेखबर थे और अपनी तैयारी में लगे हुए थे। जयपाल सिंह मुंडा को भी धोखे से दिल्ली बुलाया गया था जिसकी वजह से वे इस सभा में शामिल नहीं हो पाए थे। “झारखंड आबुवः ओडिशा जारी कबुवः”, “रोटी पकौड़े तेल में विजय पाणी जेल में” का नारा ज़ोर शोर से लग रहा था।
1 जनवरी 1948 को सुबह से ही खरसावां हाट में जुलूस निकाला गया और कुछ लोग खरसावां राजा के महल जाकर उनसे मिले और कोल्हान के लोगों की बात पहुंचाई गई। हाट में दोपहर से सभा शुरू हुई और यह सभा शाम तक चली। शाम तक भी जब जयपाल सिंह नहीं औए तो भीड़ भी थोड़ी बेकाबू होने लगी थी, और इसी वक्त उड़ीसा सरकार के सैनिकों ने अंधाधुंध मशीनगन चारों तरफ से चलाना शुरु कर दिया, और हमारे लोग कटे पेड़ की तरह गिरने लगे थे। महिला एवं पुरुषों के अलावा बच्चों पर भी गोलियां चलाई गई थी। उस समय लोग चप्पल भी बहुत कम पहनते थे, सोचने वाली बात तो यह है कि फिर भी दो-तीन ट्रक चप्पल हटाया गया और खेतों में चारों तरफ खून ही खून भरे हुए थे। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने लोग मरे होंगे। कहा जाता है इस गोलीकाण्ड में लगभग 3000-40000 लोगों की मृत्यु हुई है। ये जो गोलीकांड हुई थी यह सरकार के तरफ से ही थी इसलिए इसका रिकॉर्ड कोई भी सरकारी दफ्तर में नहीं मिलता है। आपको यकीन न हो तो आप DC ऑफिस जाकर खरसावां गोलीकांड का रिकॉर्ड माँग कर देखिए आपको नहीं मिलेगा।
हो आदिवासियों के बारे में सबसे पहले लिखित जानकारी ईसाई मिशनरियों और ब्रिटिश प्रशासकों के माध्यम से आई। हालाँकि, इससे पहले भी कुछ भारतीय इतिहासकारों और समाजशास्त्रियों ने अलग-अलग जनजातियों का उल्लेख किया था, लेकिन विशेष रूप से हो आदिवासियों पर विस्तार से लिखने का श्रेय यूरोपीय मिशनरियों और ब्रिटिश अधिकारियों को जाता है।
ब्रिटिश प्रशासक और विद्वान कर्नल एडवर्ड टॉकिन्स ने अपनी पुस्तक Descriptive Ethnology of Bengal (1872) में बंगाल की विभिन्न जनजातियों का विस्तार से वर्णन किया, जिसमें झारखंड की हो जनजाति भी शामिल थी। इस पुस्तक में उन्होंने हो समाज की सामाजिक संरचना, भाषा और रीति-रिवाजों पर गहराई से चर्चा की।
वेरियर एल्विन, जो एक ब्रिटिश मानवशास्त्री थे, ने भारत की कई जनजातियों पर शोध किया और विशेष रूप से गोंड, हो, संथाल और उरांव जनजातियों के जीवन, संस्कृति और उनकी सामाजिक समस्याओं को केंद्र में रखा। उनकी प्रमुख कृतियों में The Tribal World of Verrier Elwin, The Muria and Their Ghotul और A Philosophy for NEFA शामिल हैं। उनके शोध ने भारत में जनजातीय नीतियों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
19वीं शताब्दी में झारखंड और उड़ीसा में आने वाले ईसाई मिशनरियों ने भी हो जनजाति के सांस्कृतिक और भाषाई विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने हो भाषा के व्याकरण को संरचित किया और बाइबल का अनुवाद कर इसे दस्तावेजी रूप में प्रस्तुत किया, जिससे इस भाषा को संरक्षित करने और प्रचारित करने में सहायता मिली।
भारतीय समाजशास्त्रियों में राधाकमल मुखर्जी और लाल बहादुर वर्मा ने 20वीं शताब्दी में हो जनजाति पर गहन शोध किया। राधाकमल मुखर्जी की पुस्तक The Dynamics of Rural Society में भारतीय ग्रामीण समाज और जनजातीय समुदायों के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं का विश्लेषण किया गया। लाल बहादुर वर्मा सहित कई अन्य भारतीय विद्वानों ने स्वतंत्रता के बाद हो समाज की संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित करने के प्रयास किए, जिससे उनकी सांस्कृतिक पहचान को मजबूती मिली।
डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा आये और उन्होंने हो आदिवासियों पर गहन अध्यान किए फिर पुस्तक लिखें “हो लोककथा : एक अनुशीलन” जिसमे वे हो आदिवासियों के बारे में विस्तार से लिखें हैं। वे अपनी पुस्तक में हो जनजाति हो भाषा, लोक कथा (आख्यान, लोक कहानी), संस्कृति, किली (गोत्र) इत्यादि के बारे में विस्तार से लिखते हैं।
ये सभी गैर आदिवासी साहित्यकार थे जो हम हो लोगों के बारे में लिखें हैं।
अब हम जानेंगे हो साहित्यकारों के बारे में, वे क्या लिखते हैं आइए विस्तार से जाने।
हम 1940 से शुरुआत करते हैं। हमारे हो समाज में पहले साहित्यकार के नाम से ‘सतीश कुमार कोड़ा” को जाना जाता है। इन्होंने 1940 में हो कविता संग्रह लिखें थे पुस्तक का नाम रखें “सतीश याः रुमूल”। हम आदिवासियों में इतिहास, घटना, कहानी इत्यादि जानकारी को गीत के माध्यम से संरक्षित करते आ रहें हैं। इसी को सतीश जी ने अपने पुस्तक में गीत के रूप में ही लिखें। उनके बाद 1945 में कानू राम देवगम जी आये उन्होंने भी गीतों को अपने “हो दुर पोथी” पुस्तक में संभाल कर रखे। हो आदिवासियों के गीतों को अपने अंदाज में शिव चरण बिरुवा जी 1954 में अपने पुस्तक “दिसुम रुमुल मगे दुरं” में उतारे।
ओत गुरु कोल लाको बोदरा 1954 में ही अपने पुस्तक “एटेः तुरतुङ अखड़ा एवं वारङ चिति” में वारङ चिति को पहली बार लोगों के सामने लाये थे। यहाँ पहली बार सभी को पता चला था कि हो लोगों की भी अपनी लिपि है, जिसे “वारङ चिति” लिपि कहा जाता है। अब लाको बोदरा लिपि को लोगों को सिखाने भी लगे थे साथ ही बहुत सारे पुस्तक भी लिख रहे थे। उन पुस्तक में हो हयम पहम पुती, कोल गुरु, शिशु हलं (1&2), पोम्पो, ब्ह बुरु बोंगा बुरु, षार होरा (182) षड़ा बुड़ा सगेन, हो बाकणा इत्यादि लिखें। “हो बाकणा” हो लोगों का व्यकारण है।
हो समुदाय में एक साहित्यकार ऐसे भी थे जिन्होंने हो समुदाय में होने वाले लगभग हर चीज के बारे में विस्तार से बताये हैं, वो है “धनुर सिंह पुरती जी। उन्होंने “हो दिसुम हो होनको” यह पुस्तक एक अलग ही स्तर की है इसका कुल 7 भाग है। भाग 1 (1978) में जोनोम, ऑदि ओण्डोः गोनोयः दोस्तुर (जन्म, शादी और मृत्यु संस्कार), भाग 2(1978) में पोरोब को (पर्व-त्यौहार), भाग 3 (1979) में अथिति सत्कार, सम्बन्धियों के प्रति सम्मान, विधि निषेध की परंपरा, भाग 4 (1979) में सिंङ बोंगा ओण्डोः बोंगा को (देवी देवताओं), भाग 5 (1980) में हो होन को नेन जिनिड रे (इस जिन्दगी में हो बच्चे), भाग 6 (1981) में संगर और भाग 1982) में मुनु जनागर को ओण्डोः बंकुड़ि है।
हम हो लोगों में मागे पोरोब का एक बहुत प्रसिद्ध गीत है-
बुरु बितेर मागे दो,
पता बितेर मागे दो,
चिके तेरे “दाणाचुम/दड़ाचुम”
नायुमे लेडा? “कों” 2
रुतु रुड़ी रुड़ी लेंगे
बनम चैयों चैयों तेंगे
अपे हातु मागे दोइंग
नायुमे लेडा “कों” 2
यह मागे लोक गीत लगभग सभी हो साहित्यकार अपने अपने अंदाज में अपनी पुस्तक पर उतारे हैं। इस गीत का भाव (अर्थ) इस प्रकार है:- “बुरु” का मतलब होता है “जंगल/पहाड़/पर्वत”। दड़ाच “कालकलाची/काला भुजंगा (Black drongo)” है पर यहाँ प्रेमी को बताया गया है। बनम “केंदरी” और रुतु “बांसुरी” है। गीत में प्रेमिका प्रेमी से कहती है – “जंगल अंदर का मागे पोरोब (पर्व) और घने पत्तों के बीच का मागे पोरोब के बारे कैसे पता चला?” यहाँ प्रेमी जवाब देते हैं- “बांसुरी बजाते हुए, बनम बजाते हुए ही हमें पता चला।”
बाः पोरोब के लिए भी एक प्रेम प्रसंगयुक्त गीत है। ये गीत इस प्रकार है-
दोला गुइराम मदुकम हालांग बिर बिर बुरु ताला रे गोड केते सरजोम रह बा बोः रेदो सुपिदा माइंग।।
दोला गुड्रराम मदुकम हालांग बिर बिर बुरु ताला रे गोड केते सरजोम रह बा बोः रेदो सुपिदा लेमे तइंग ।।
यह बा पोरोब का प्रसिद्ध गीत है। गुइराम का अर्थ भाभी की बहन /जीजा का भाई दीदी की ननद / भैया की साली, मदुकम का अर्थ महुआ और सरजोम बा का अर्थ सराई का फूल है। इस गीत में प्रेमी अपने प्रेमिका को कहते है-“चलो प्रिय महआ चुनने, जंगल के अंदर। सराई का फूल तोड़ के तुम्हरा कोपा में लगाएंगे।” प्रेमिका जवाब देती है-चलो पिया महुआ चुनने, जंगल के अंदर। सराई का फूल तोड़ कर मेरा कोपा में लगा दो।”
बा पोरोब का एक और गाना है। इसमें सरजोम बा को घर बुलाने के लिए गाया गया है।
मारंग बुरु रिया सराजोम बड़ा
सराजोम बड़ा दोरे एकेलान ताना
हुडिंग बुरु रिया सुड़ा सगेन
सुड़ा सगेन दोरे तायुरेन ताना।। 2
बोदे बोदे बॅगाए मेरे दिउरी कोड़ा
सराजोम बड़ा दोरे एकेलान ताना
बोदे बोदे लुंडे मेरे दिउरी एरा
सुड़ा सगेन दोरे तायुरेन ताना।। 2
दिउरी रचा दोको जोओः गुरी किरा
एला रे अड़ा दुन में सराजोम बड़ा
सिरजोन कुड़ी दोए/डोले लुंडे सरिल किड़ा
एला रे नोसोरेन में सुड़ा सगेन ।।2
