Ho bhasha aur sahity ka itihas

Ho bhasha aur sahity ka itihas

Ho bhasha aur sahity ka itihas

Ho Society Ho History of Ho language and literature ज्ञातव्य है कि इतिहास लेखन के माध्यम से विश्व मानव का एक जीवन्त आख्यान प्रस्तुत किया जाता रहा है। इतिहास सदियों से मानव जीवन को उत्प्रेरित और प्रभावित करता रहा है। अतीत के सम्पूर्ण यथार्थ को वर्तमान के दर्पण में प्रतिबिम्बित करना इतिहास का मूल प्रयोजन रहा है। इतिहास मात्र तथ्यों का संकलन नहीं वरन् काल पुरुषों का मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक अनुशीलन भी है। प्रत्येक साहित्य का भी अपना इतिहास होता है, जिसमें उसका सम्पूर्ण जीवन-दर्शन समाहित रहता है। साहित्य के इतिहास लेखन में मानव की सांस्कृतिक चेतना के विकासक्रम का अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। प्रत्येक साहित्य मे युगधर्म, उसकी अखंड चेतना और शाश्वत सत्य की अभिव्यंजना मिलती है। इतिहास प्रायः शिष्ट एवं सभ्य समाज तथा अभिजात वर्ग के सामाजिक, राजनैतिक जीवन का परिचय भर प्रस्तुत करता है। किन्तु साहित्य का इतिहास समाज के सभी वर्गों की लोक चेतना को प्रतिबिम्बित करता है। अतएव साहित्य का इतिहास मात्र इतिहास न होकर, लोक मानस और मानव जाति की सांस्कृतिक चेतना और विकासशीलधारा का कालक्रम से अध्ययन-मूल्यांकन करने का एक महत्वपूर्ण साधन भी है। इस प्रकार साहित्य का इतिहास जन-समूह के सांस्कृतिक विकास के अध्ययन की पीठिका है। फ्रेंच विद्वान् तेन (तैना) के अनुसार “साहित्य की विभिन्न प्रवृत्तियों के मूल में तीन तत्व होते हैं जाति (रेस), वातावरण (एनवायरनमेंट) और क्षण विशेष (मोमेंट)”। इससे यह स्पष्ट होता है कि साहित्य इतिहास के लेखन में देश या किसी प्रदेश विशेष की जातीय परम्पराओं, राष्ट्रीय, सामाजिक और सामयिक परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है।

ऑष्ट्रिक भाषा समूह की “हो” भाषा के सन्दर्भ में भी उक्त बातें तथ्यपूर्ण और समीचीन लगती हैं। “हो” भाषा एक क्षेत्र विशेष सिंहभूम की लोक भाषा है, जिसकी एक अतिप्राचीन मौखिक परम्परा रही है। ऐसी भाषाओं के सन्दर्भ में डॉ० रामकुमार वर्मा का यह कथन काफी प्रासंगिक लगता है- “किसी निर्जन वन-प्रदेश की शैवालिनी की भाँति हिन्दी साहित्य की धारा अबाध रूप से अवश्य प्रवाहित होती रही, किन्तु उसके उद्‌गम और विस्तार पर आद्यन्त और विस्तृत दृष्टि डालने का प्रयास बहुत दिनों तक नहीं हुआ।”
“हो” भाषा के सन्दर्भ में भी यह अत्यधिक प्रासंगिक है, क्योंकि इस भाषा के इतिहास लेखन का सप्रयास अभी तक नहीं किया जा सका है। प्रारंभिक काल में जनजातीय साहित्य (लोककथा, गीत, पहेलियाँ आदि) के सन्दर्भ में लेखन कार्य यूरोपीय या अंग्रेज लेखकों/प्रशासकों/पादरियों द्वारा अंग्रेजी भाषा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया था। “हो” साहित्य के
साथ भी ऐसा ही हुआ। ज्ञातव्य है कि रिजले, एलविन, डाल्टन, आर्चर आदि ने ‘हो’ जनजाति के सन्दर्भमें महत्वपूर्ण लेखन कार्य किये। रेव.ए. नोट्रोट तथा एल. बरोज जैसे विद्वानों ने ‘हो’ भाषा के व्याकरण तथा शब्दकोष पर महत्वपूर्ण कार्य किये। परन्तु ‘हो’ भाषा और साहित्य के इतिहास पर कोई लेखनकार्य नहीं हो सका था।

यह ज्ञातव्य है कि किसी प्रदेश एवं उस प्रदेश (क्षेत्र) में निवास करने वाले समुदाय की बोली एवं भाषा के विकास की पृष्ठभूमि हजारों वर्ष पूर्व की होती है, जिसका कालक्रमानुसार क्रमिक विकास होता रहता है। किसी भी भाषा और उसके साहित्य का इतिहास उससे संबद्ध क्षेत्रीय बोली के सुविकसित रूप की विकास यात्रा की अभिव्यक्ति होती है। जो क्षेत्रीय बोली कभी केवल बोल-चाल के लिए प्रयुक्त होती थी, आगे चलकर वह क्षेत्र विशेष की भाषा बन गई, जो साहित्य लेखन का माध्यम बनी। कोई भी बोली जब वैयाकरणिक नियमों में आबद्ध होकर रूढ़ हो जाती है, तो ‘भाषा’ के रूप में अपनी पहचान बना लेती है।
“हो” भाषा और उसके इतिहास की जड़ें उनके अति प्राचीन एवं विकसित सभ्यता और संस्कृति के पुराकालिक अवशेषों में निहित हैं, जो सिन्धुघाटी में अवस्थित हड़प्पा, मोहनजोदड़ों आदि स्थानों की खुदाई में मिली है। इससे स्पष्ट होता है कि सिन्धुघाटी में लगभग २०००-१५०० ई.पू. के कालखंड में यायावर आर्यों के आगमन के पूर्व, आस्ट्रिक भाषा-भाषी जनजातियाँ (संताल, मुंडा, खरवार, असुर, हो आदि) उस क्षेत्र में अनादि काल से बसी हुई थी।

डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने आग्नेय या ऑस्ट्रिक भाषा के मूलरूप को ‘खेरवारी’ कहा है, जिससे मुंडा, संताल, आसुरी, बिरहोरी, हो आदि भाषाओं का विकास हुआ। हो भाषा और साहित्य के लेखन, प्रकाशन और प्रचार-प्रसार में कतिपय विदेशी मूल के लेखकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसमें जॉन हॉफमैन, सी.एच. बोम्पास, एल. बरो, वैरियर एल्विन, जी.ए. ग्रियर्सन, फादर जे. डिन्नी आदि का नाम उल्लेखनीय है। इसके अतिरिक्त शरतचन्द्र राय, डी.एन. मजूमदार, सुकुमार हलधर, कान्हूराम देवगम, लाको बोदरा, सतीश कुमार कोड़ाह, धनुर सिंह पूर्ति आदि विद्वानों ने भी “हो” लिखित साहित्य के विकास में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है।
यह स्मरणीय है कि उमाशंकर, जो एक प्रशासनिक (वित्त सेवा) पदाधिकारी थे, जिन्होंने ‘संताली भाषा और साहित्य का इतिहास’ शीर्षक पुस्तक की रचना १९६६ में की थी। संताली भाषा भी ऑस्ट्रिक भाषा समूह की ही एक जनजातीय भाषा है, जिसकी हो भाषा से काफी समानता है। उन्होंने भाषा विज्ञान के अध्ययन के सन्दर्भ में लिखा है कि १८वीं सदी में विदेशी विद्वानों द्वारा भारतीय भाषाओं का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया गया था। उनमें अग्रणी डॉ० जॉनबीम्स थे, जिन्होंने अपनी वृहत् पुस्तक “कंपेयरेटिव ग्रामर आफ द माडर्न एरियन लैंग्वेजेज आफ इण्डिया” को तीन भागों में प्रकाशित किया। १८७२ में प्रथम भाग में भाषागत ध्वनियों पर प्रकाश डाला गया। १८७५ में दूसरे भाग का प्रकाशन हुआ, जिसमें संज्ञा और सर्वनाम पर विचार किया गया। १८७९ में तीसरा भाग प्रकाशित हुआ, जिसमें क्रिया पर विचार किया गया। इस प्रकार जॉनबीम्स ने भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक का काम किया। भाषा विज्ञान के आधार पर ही भाषाओं के पारिवारिक समूह का वर्गीकरण किया गया।”हो” भाषा, जो ऑस्ट्रिक समूह की एक प्रमुख उपभाषा है, इसका भाषा वैज्ञानिक स्वरूप संस्कृत से काफी मिलता-जुलता है। अतः इस भाषा के संरक्षण, विकास एवं विस्तार के लिए यह आवश्यक प्रतीत होता है कि इस भाषा के उद्भव और विकास, इसकी भाषिक विशिष्टता, इसमें उपलब्ध मौखिक एवं शिष्ट (प्रकाशित) साहित्य, “हो” भाषा से संबंधित लिपि ‘वारङ्ङ्घिति’ आदि पर सांगोपांग विचार एवं गवेषणा कर उन्हें “हो” साहित्य के इतिहास के रूप में प्रस्तुत किया जाय। इस पुस्तक के माध्यम से “हो” भाषा से संबंधित रचनाओं एवं उनके लेखकों/कवियों का अभिलेखीकरण का एक लघु प्रयास किया गया है।
यह उल्लेखनीय है कि “हो” जनजाति का परिचय, उनका सिंहभूम में प्रव्रजन, उनकी सांस्कृतिक विशिष्टता आदि पर भी यथेष्ट प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। “हो” लोककथा पर सम्पन्न शोध कार्य के बाद प्रकाशित पुस्तक “हो लोककथा: एक अनुशीलन” के बाद की यह दूसरी प्रस्तुति है। आशा है “हो भाषा और साहित्य का इतिहास” शीर्षक पुस्तक “हो” विद्वानों के अतिरिक्त ऑस्ट्रिक समूह की अन्य जनजातीय भाषाओं के पाठकों के लिए भी रूचिकर एवं एक विनम्र प्रस्तुति लगेगी। “हो” भाषा और साहित्य के इतिहास लेखन की दिशा में यह पुस्तक अग्रदूत की भूमिका निभायेगी, यही आशा है।
★★★

स्रोत – हो भाषा और साहित्य का इतिहास
लेखक – डॉ आदित्य प्रसाद सिन्हा

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