Nirsandi amavasya ka gahan prakrti va vaigyanik arth
🌑 निरसांदि : अमावस्या का गहन, सांस्कृतिक, प्राकृतिक व वैज्ञानिक अर्थ
हो समाज में चन्द्रमा का हर चरण केवल खगोलीय घटना नहीं है, बल्कि जीवन, प्रकृति और मनुष्य के संस्कारों से सीधे जुड़ा हुआ प्रतीक है। इन्हीं चन्द्रचरणों में एक विशेष महत्व रखता है—
निरसांदि (अमावस्या) जिसे हो भाषा में गहरे अर्थों और वारङ चिति लिपि के अक्षरार्थों द्वारा समझाया जाता है।
🌑निरसांदि का सामान्य अर्थ
निरसांदि = अमावस्या
यह दो शब्दों से बना है—
निर = दौड़ना, भागना
सांदि = गायब, अदृश्य
👉 जब चन्द्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमते-घूमते एक ऐसे स्थान पर पहुँच जाता है जहाँ वह पूरी तरह अदृश्य हो जाता है, वही अवस्था निरसांदि (अमावस्या) है।
🌙 चन्द्रचक्र और जीवन के तीन संस्कार
हो समाज में तीन प्रमुख संस्कार हैं—
1. जन्म (चाण्डु: मुलु: – चन्द्रदर्शन)
2. विवाह (पोनइ – पूर्णिमा)
3. मरण (निरसांदि – अमावस्या)
चन्द्रमा का प्रत्येक चरण मनुष्य के जीवनचक्र का प्रतीक माना गया है:
जन्म — जब पतला, कोमल चाँद पहली बार दिखाई देता है।
विवाह — जब चाँद पूर्ण, उज्ज्वल और पूरा खिला होता है।
मरण — जब चाँद पूरी तरह गायब हो जाता है, और अँधेरा रह जाता है।
इस प्रकार चन्द्रमा = जीवन का दर्पण है।
🌑निरसांदि का वारङ चिति लिपि में अक्षर-विचार
निरसांदि = नुङ + वि:इ + हर + सि + अ: + ङ्: + द: + वि:इ
अब इन्हें बहुत सरल शब्दों में समझते हैं
1) नुङ = सूक्ष्म, अंडा, घूमने वाला बीज
चन्द्रमा का सबसे सूक्ष्म, मूल रूप जो दिखाई नहीं देता।
2) वि:इ = प्राण, केंद्र, उत्पत्ति शक्ति
ऊर्जा का वह बिंदु जहाँ से नया चक्र शुरू होगा।
3) हर = रक्षा, सुरक्षित करना
यह अँधेरा चरण प्रकाश को भीतर सुरक्षित रखता है।
4) सि = मृत्यु, निर्जीव, शांत अवस्था
यह चन्द्रमा का मृत्यु-समान शांत और अंधकारमय समय
5) अ: = रात, धूल, दुख, छाया
अमावस्या की गहरी, धुँधली रात का संकेत।
6) ङ्: = रोशनी, चमक, ऊर्जा
इसी अँधेरे में भविष्य की रोशनी छिपी होती है।
7) द: = द्वीप, संगम, जल
पृथ्वी, जल और ऊर्जा के केंद्र का संकेत।
8) वि:इ = फिर से केंद्र, प्राण, नई शुरुआत
अंधकार से निकलकर प्रकाश का नया जन्म।
🌑निरसांदि का संयुक्त अक्षरार्थ
“सूक्ष्म ऊर्जा, केंद्र में सुरक्षित होकर
मृत्यु-समान रात में छिप जाती है,
और फिर प्रकाश बनकर द्वीप-समान केंद्र से
नए जीवन की शुरुआत करती है।”
👉 अमावस्या = मृत्यु नहीं, बल्कि अगली रोशनी का गर्भ।
🫀वैज्ञानिक दृष्टिकोण
सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में आते हैं।
चन्द्रमा का प्रकाशित हिस्सा पृथ्वी की ओर नहीं होता।
इसलिए वह पूर्णत: अदृश्य हो जाता है।
यह प्राकृतिक कारणों से होने वाली पूर्ण अंधेरी रात है।
🫀दार्शनिक दृष्टिकोण
हर अंधकार में प्रकाश का बीज होता है।
निरसांदि सिखाती है:
“शून्य ही नया आरम्भ है।”
🫀मानवीय जीवन दृष्टिकोण
जैसे चाँद गायब होकर फिर से जन्म लेता है,
वैसे ही मनुष्य का हर दुख, हर अंत –
एक नई शुरुआत का संकेत है।
🫀हो संस्कृति का दृष्टिकोण
यह वह समय है जब चंद्र-ऊर्जा शांत होती है।
🧠संस्कार दृष्टिकोण
जैसे जन्म → विवाह → मृत्यु,
वैसे ही चन्द्रमा भी:
चन्द्रदर्शन → पूर्णिमा → अमावस्या
जीवन की पूर्ण यात्रा दोहराता है।
अमावस्या = जीवनचक्र का मरण-बिंदु,
परंतु मरण ही अगले जन्म की भूमिका है।
🌑 निरसांदि की सार-भावना (बहुत सरल में)
चाँद अदृश्य होता है → यही निरसांदि है।
यह जीवन के “मरण” चरण जैसा है।
पर इसके भीतर नई रोशनी छिपी होती है।
हर अंधेरा एक नई शुरुआत को जन्म देता है।
निरसांदि = अंत नहीं, नया जन्म होने का समय।
