Pradhan Gagrai | Biography and Literary Contributions
प्रधान गागराई हो समाज के प्रतिष्ठित लेखक, शोधकर्ता, लोकपरंपरा के संरक्षक तथा समाज-चिंतक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन हो समाज के इतिहास, संस्कृति, परंपराओं, वंशावली, धार्मिक मान्यताओं तथा सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण, अध्ययन और लेखन को समर्पित किया।
प्रारम्भिक जीवन
प्रधान गागराई का जन्म 03 जनवरी 1929 को झारखंड के वर्तमान पश्चिम सिंहभूम जिले के टक्कर बापा डुमुरिया गाँव में हुआ। उनके पिता का नाम माटा हो तथा माता का नाम शुरु कुई था। उनकी पत्नी का नाम नमसि कुई था। बाद में उनका परिवार करसाकोला (बसकी) गाँव में बस गया।
पारिवारिक पृष्ठभूमि
उनके दादा का नाम प्रधान हो था। उनके दो पुत्र हुए—माटा और बामिया। माटा हो के दो पुत्र हुए—हरदेव तथा प्रधान गागराई। आगे चलकर प्रधान गागराई ने साहित्य एवं शोध के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई।
व्यावसायिक जीवन
प्रधान गागराई चाईबासा कॉपरेटिव बैंक में कार्यरत रहे। बैंक सेवा के साथ-साथ उन्होंने निरंतर अध्ययन, अनुसंधान और लेखन का कार्य जारी रखा। उनका विश्वास था कि किसी भी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी भाषा, संस्कृति, इतिहास और परंपरा में निहित होती है।
साहित्यिक योगदान
उन्होंने हो समाज की किलि (गोत्र) व्यवस्था, वंशावली, धार्मिक परंपराओं, सामाजिक नियमों तथा इतिहास पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।
प्रमुख कृतियाँ
– जागर ओतोङ (किलि का कुर्षिनामा)
– मरं वोङ्गा (जिरका पाट मरं वोङ्गा)
– कोक-पाट मुन्डा राजा
– गागराई कोव: नियमाबति
– कड़िया को ओन्डो: उरांव को
– वोङ्गा नम पञ्जा नम
– कलंकि अवतार
योगदान एवं विरासत
प्रधान गागराई ने समाज के बुजुर्गों से प्राप्त ज्ञान, लोककथाओं, धार्मिक परंपराओं तथा ऐतिहासिक स्मृतियों को लिखित रूप देकर आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर सुरक्षित की। उनका साहित्य आज भी हो समाज के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं के अध्ययन का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है।
निधन
11 जनवरी 2008 को उनका निधन हो गया। यद्यपि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, किंतु उनकी रचनाएँ आज भी शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा समाज के लिए प्रेरणा और सांस्कृतिक संरक्षण का आधार बनी हुई हैं।

