Customs of Singhbhum
📜 कोल्हान गवर्नमेंट इस्टेट ऐतिहासिक एवं संवैधानिक आधार
1. एसियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल – 1840 ई.
“जर्नल ऑफ द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल” (1840) में हो दिषुम (Customs of Singhbhum) का उल्लेख मिलता है।
इसमें बताया गया कि हो समाज की अपनी प्राचीन शासन व्यवस्था (मानकी-मुंडा प्रणाली) विद्यमान थी और ब्रिटिश सरकार ने इसे मान्यता दी थी।
यह पहला लिखित साक्ष्य है जो दर्शाता है कि कोल्हान क्षेत्र की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था स्वतंत्र व पारंपरिक थी।
2. अनुसूचित जिला अधिनियम – 1874
इस अधिनियम की धारा 3, 5 एवं 5A के तहत कोल्हान क्षेत्र को “Scheduled District” (अनुसूचित जिला) घोषित किया गया।
इसका अर्थ हुआ कि यह क्षेत्र विशेष संरक्षित शासन व्यवस्था के अंतर्गत रहा।
ब्रिटिश संसद द्वारा “सपरिषद भारत सचिव” (Secretary of State for India in Council) को यह अधिकार दिया गया कि वह कोल्हान गवर्नमेंट की स्वायत्तता और सुरक्षा बनाए रखे।
3. भारत सरकार अधिनियम – 1935
धारा 91 व 92 के तहत कोल्हान को “Excluded & Partially Excluded Areas” की श्रेणी में रखा गया।
इन क्षेत्रों को Self-Governing Area (स्वशासित क्षेत्र) का दर्जा मिला।
यहां की पारंपरिक पंचायत–मानकी मुंडा शासन व्यवस्था को कानूनी मान्यता प्राप्त रही।
4. भारत स्वतंत्रता अधिनियम – 1947
इस अधिनियम की धारा 7(c) के अनुसार भारत आज़ादी के बाद भी कोल्हान गवर्नमेंट का विशेष दर्जा यथावत रहा।
इसे स्वशासित क्षेत्र के रूप में मान्यता प्राप्त रही।
5. भारतीय संविधान – 1950
संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 372 में यह प्रावधान किया गया कि
“भारत के संविधान लागू होने से पहले के सभी कानून, नियम और रीति-रिवाज तब तक मान्य रहेंगे जब तक कि उन्हें संविधान द्वारा निरस्त न कर दिया जाए।”
इसका अर्थ यह है कि कोल्हान गवर्नमेंट की मानकी–मुंडा शासन व्यवस्था संवैधानिक रूप से जारी रही।
इसके अतिरिक्त पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत भी आदिवासी स्वायत्त शासन व्यवस्था को संरक्षण मिला।
6. बिहार राज्य पुनर्गठन अधिनियम – 2000
जब झारखंड राज्य का गठन हुआ, तब धारा 84 के तहत कोल्हान क्षेत्र को स्वशासित क्षेत्र (Autonomous Area) माना गया।
मानकी–मुंडा शासन प्रणाली बरकरार रही और इसे आदिवासी समाज की स्थानीय शासन व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया गया।
7. कोल्हान री-सेटेलमेंट (1913–1918)
इस भूमि सर्वेक्षण और खतियान प्रक्रिया के दौरान यह प्रमाणित हुआ कि भूमि और प्रशासन व्यवस्था मानकी-मुंडा प्रणाली के अंतर्गत संचालित थी।
री-सेटेलमेंट रिकॉर्ड्स आज भी प्रमाण देते हैं कि यह एक पारंपरिक स्वशासन प्रणाली है।
8. बंगाल रेगुलेशन – 13 (1833)
2 दिसम्बर 1833 को गवर्नर जनरल इन काउंसिल द्वारा बनाया गया।
इस रेगुलेशन का मुख्य उद्देश्य भारत के राजा, जमींदारों और सामंतों द्वारा लागू दास-प्रथा को समाप्त करना था।
इस प्रकार दास प्रथा समाप्त कर सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया गया।
9. विल्किंसन रुल्स – 1837
कोल्हान क्षेत्र के लिए विशेष रूप से लागू किया गया।
इसमें Customary Law (सामाजिक प्रथा और परंपरागत शासन व्यवस्था) को कानूनी मान्यता दी गई।
मानकी-मुंडा शासन प्रणाली को विधिक मान्यता प्राप्त हुई।
कोल्हान गवर्नमेंट कोई काल्पनिक या मौखिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह इतिहास, औपनिवेशिक कानून, भारतीय संविधान और आधुनिक अधिनियमों में स्पष्ट रूप से मान्यता प्राप्त शासन प्रणाली है।
यह व्यवस्था लोकतांत्रिक, विकेन्द्रित और सामुदायिक शासन का आदिवासी रूप है, जो आज भी कोल्हान क्षेत्र में जीवित है। इस प्रणाली को “फाजिल क्षेत्र” अथवा “स्वशासित क्षेत्र” के रूप में मान्यता प्राप्त है।
References)
1. Journal of the Asiatic Society of Bengal, 1840 – Customs of the Singhbhum (Ho Dishum).
2. Scheduled Districts Act, 1874 – Sections 3, 5 & 5A.
3. Government of India Act, 1935 – Sections 91 & 92.
4. Indian Independence Act, 1947 – Section 7(c).
5. Constitution of India, 1950 – Article 372, 13(3)क, Fifth Schedule.
6. Bihar Reorganisation Act, 2000 – Section 84.
7. Kolhan Settlement Records (1913–1918).
8. Bengal Regulation XIII of 1833.
9. Wilkinson Rules, 1837 – Kolhan Customary Law.
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