prakrti aur shareer mein shirma kis rup mein maujood hai
प्रकृति और शरीर में षिर्मा(आकाश) किस रुप में मौजूद है।
षिर्मा = षिर + मा
षिर = जड़, नस, मूल संरचना — यह शरीर की जड़ ऊर्जा या आधार का प्रतीक है।
मा = मां, जननी, आवश्यकता — जो उत्पत्ति का मूल है।
इससे “षिर्मा” का सामान्य अर्थ :-
“जड़ (मूल) से उत्पन्न, या मूल मां के समान जो सबको धारण करे” यानी — आकाश या वह विस्तार जो सबका आधार है।
वारङ चिति लिपि में विश्लेषण इस प्रकार है
षिर्मा = षु + वि:इ + हर + अम + अ:
अक्षरार्थ :-
अक्षर = अर्थ = प्रतीकात्मक अर्थ
षु=ध्वनि, रास्ता=गति, तरंग या कम्पन (वाइब्रेशन)
वि:इ=सांस, अंकुर, उत्पत्ति=जीवन शक्ति, ऊर्जा प्रवाह
हर=संरक्षक, रगड़ना=परिवर्तन और संतुलन की प्रक्रिया
अम=शरीर, संभालना, रोकना=स्थूल रूप या पदार्थ
अ:=धूल, कोहरा, उड़ते बादल,=दुख सूक्ष्म अवस्था या वाष्पीय ऊर्जा
👉 इन सबका सम्मिलित अर्थ बनता है
“ध्वनि (षु) से उत्पन्न जीवन शक्ति (वि:इ) जो संरक्षण (हर) और स्थूल शरीर (अम) में होकर सूक्ष्म रूप (अ:) में परिवर्तित होती है।”
यही तो आकाश तत्व का कार्य है – तरंगों को धारण करना, कंपन को मार्ग देना, और अदृश्य ऊर्जा का माध्यम बनना। “आकाश शरीर में वो स्थान है जहां से ध्वनि नस-नस में रगड़ कर बाहर निकलती है” यह वास्तव में नाड़ी और प्राण तंत्र की वैज्ञानिक व्याख्या जैसा है। ध्वनि = कम्पन = ऊर्जा = प्राण। यह “षिर्मा” के माध्यम से शरीर और ब्रह्मांड दोनों में प्रवाहित होती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से – आकाश या Space वास्तव में “खाली” नहीं, बल्कि ऊर्जा और तरंगों से भरा माध्यम है।
जिस प्रकार – ध्वनि वायु में तरंगों के रूप में चलती है,
उसी प्रकार विद्युत चुंबकीय तरंगें (जैसे प्रकाश, रेडियो तरंगें) अंतरिक्ष (Space) में चलती हैं।
“ध्वनि का मध्यम जो नहीं पकड़ सकते हैं उसी प्रकार शरीर में जो याद और नशीब है वो भी नहीं पकड़ सकते” यह अत्यंत सूक्ष्म लेकिन सही तुलना है।
याद(उड़ु:)(Memory)और नशीब(लोसिब)(Destiny) दोनों ही ऊर्जा के रूप में कार्य करते हैं — अदृश्य लेकिन प्रभावी। षिर्मा वह अदृश्य ऊर्जा क्षेत्र है,
जहां ध्वनि, स्मृति, प्राण और चेतना का आदान-प्रदान होता है। यह ब्रह्मांडीय “आकाश” और मानव शरीर के “शून्य स्थल” दोनों को जोड़ता है। यह न दिखने वाला, परंतु सबको जोड़ने वाला माध्यम है ध्वनि का घर, स्मृति का रास्ता और चेतना का आकाश।
