Chaibasa shaheed park ka itihas
चाईबासा शहीद पार्क का क्या इतिहास है जिस हो विद्रोह के याद में शहीद पार्क का निर्माण अंग्रेजों ने ही देश आजादी के पूर्व की थी। जिसका उद्घाटन तत्कालीन बिहार,ओडिसा के गवर्नर गार्नियर मोरिस हैलेट ने 6 अक्टूबर 1937 को किया था। जिस हो विद्रोह को अंग्रेजों ने पचास साल तक नहीं भूल पाए। और हो विद्रोहियों को अंग्रेजों ने ही असाधारण वीरता वाले जाति का उपाधि दिया था। जिन्हें अंग्रेजों के रिपोर्ट के अनुसार कोल्हान की भू संपदा पर उनकी स्वतंत्रता,संप्रभुता,स्वशासन प्रणाली से छेड़छाड़ करना कतई बर्दाश्त नहीं था। कोल्हान की भू संपदा पर अपना आधिपत्य कायम रखने के लिए हो लड़ाके अंग्रेजों से निरंतर 17 वर्षों तक लड़ते रहे।
किसी दिकू को जमीन का स्थानांतरण पर रोक का अधिकार दिया गया।
थॉमस विलकिंसन ने बहुत ही होशियारी रणनीतिक कदमों से कोल्हान को अपना नियंत्रण में करके ब्रिटिश प्राधिकार को स्थापित किया। कोल्हान में प्रवृत्त स्वशासन मानकी मुंडा प्रणाली को अधिकार संपन्न बनया। उन्हें कोल्हान के गांव को संगठित करने का अधिकार सौंपा।जमीन जोत के बदले प्रति हल मालगुजारी वसूलने का अधिकार प्रदान की। जमीनी विवाद का निष्पादन करने के लिए कोल्हान कोर्ट में न्याय पंच का अधिकार सौंपा।किसी दिकू को जमीन का स्थानांतरण पर रोक का अधिकार दिया गया। लेकिन इसके बाद भी कोल्हान के हो विद्रोही देश आजाद होने तक अंग्रेजों के खिलाफ लड़ना नहीं छोड़ा। इसका सबसे अच्छा उदाहरण पोटो हो,नारा हो, बडाई हो, पांडुआ हो, बोड़ो हो, गोनो हो,रसिका मानकी,सुखलाल सिंकु सरीके कई स्वतंत्रता सेनानी हो समुदाय से हुए।जिन्होंने अपने को पेड़ पर ग्रामीणों के सामने फांसी दिए जाने के बाद भी हंसते हुए फांसी पर लटक गए थे । और सैकड़ों हो स्वतंत्रता सेनानियों को केंद्रीय जेल में उम्र कैद का सामना भी करना पड़ा।अलग बात है कि इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने अंग्रेजों के खिलाफ आदिवासियों की स्वतंत्रता, संप्रभुता और पारंपरिक स्वशासन प्रणाली को बचाए रखने के लिए की गई संघर्ष को लिखने का काम नहीं किया हो। जिसे पूर्वाग्रह ही कहा जा सकता है। भारत की स्वतंत्रता का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों ने आदिवासियों के इतिहास के साथ निष्पक्ष नहीं हो पाया। देश के विभिन्न हिस्से में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले आदिवासी इतिहास का उपेक्षा ही किया गया।
इसलिए आज के युवा पीढ़ी के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। अपने गौरवशाली इतिहास को जानना आवश्यक है। उससे प्रेरणा लेना जरूरी है। अपनी आत्मसम्मान और स्वाभिमान जगाने के लिए इतिहास ही सहायक बनता है। क्योंकि इतिहासकारों ने ही इतिहास के पन्नों पर लिखा है। जिन जाति समाज का कोई गौरवशाली इतिहास ना हो उन जाति समाज को समाप्त होने में कोई समय नहीं लगता। क्योंकि उनके अंतस में आत्मसम्मान और स्वाभिमान का संकट हो जाता है । वे हीनभावना से ग्रसित हो जाते है। यही कारण है कि वैसे जाति समाज दुर्बल और दीनहीन हो जाते है। आएं हम सभी अपनी गौरवशाली इतिहास पर गौर फरमाएं। उन अमर वीर बलिदानियों को नमन करें। जिनकी वीरता को अंग्रेजों ने भी पचास साल तक नहीं भूला सका। जिनके याद में ईमानदारी से शहीद पार्क चाईबासा को एक धरोहर के रूप में बनाकर गए। उन 50 अमर वीर हो विद्रोहियों को 25 मार्च को हो दस्तूर के अनुसार दुल सुनूम कर श्रद्धा सुमन अर्पित करें। और खंडित हो रही स्वाभिमान को फिर से जागृत करें। कोल्हान की भू संपदा पर आधिपत्य कायम रखने के लिए शहादत देने वाले उन अमर वीर हो लड़ाकों को नमन,नमन और नमन करने के लिए शहीद पार्क चाईबासा पहुंचे।
