Ho bhasha sahitya ati pracheen hai

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Ho bhasha sahitya ati pracheen hai हो भाषा साहित्य की इमारत की नींव अति प्राचीन है। इसकी प्राचीनता का आभास अगस्त्य(हगाष्तो:ए) ऋषि के विंध्याचल पर्वत (बिङदोयाचल बुरु) पार करने से कई हजार वर्ष पूर्वb प्राग्वैदिक काल तक हमें मिलता है जबकि जम्बुद्विप(जम्बुडिपा) पर टुअर कोड़ा कसरा कोड़ा का अवतार हुआ था/ इस काल का अनुमान मोहेञ्जोदड़ो (मञ्जुदोड़ो) की सभ्यता के पूर्व प्राग्वैदिक काल लगता है/ इन दोनों काल के मध्य में धन्वन्तरी(देवांतुरी) नामक आयुर्वेद पुस्तक की रचना हुई थी/ किंवदंती है कि “धन्वन्तरी” उस काल में इसी लिपि में लिखी गई थी जो अब ‘सिञबुई’ वर्तमान टुकड़ा सिंहभूम के ‘हो’ जनजाति के वोच प्रचलित ‘वोङ्गा अंका’ है जिसे #वारङ_चिति लिपि के नाम से जानी जाती है/ प्राग्वैदिक काल के राजाओं के राज्य काल में जब #गिरुनगर और #चोम्पानगर की सभ्यता थी तब तीनों लोक की ‘#देवी_मञ्जुश्री_रानी के समय #मोहेञ्जोदड़ो की सभ्यता चरम सीमा पहुंच चुकी थी/ यही सभ्यता बाद में चल कर सिन्धु सभ्यता से अभिहित हुई जिसका काल 6000 ई• पूर्व तक जाता है । यही सिन्धु सभ्यता हिन्दु-सभ्यता बनी जो भारतीय सभ्यता का भी मूल आधार है।

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