kol ho sanskriti darpan

Kol Ho Sanskriti Darpan

Kol Ho Sanskriti Darpan-कोल हो संस्कृति दर्पण

“हो” कोल जन जाति की संस्कृति के अध्ययनार्थ दर्पण।
प्रगतिशील वैज्ञानिक युग में खास कर राष्ट्रीय संगठन एवं भारतीय स्वतंत्रता के अस्तित्व रक्षार्थ विचार धारा की परख से साफ प्रतीत होता है कि भारत एक संयुक्त सामाजिक राष्ट्र है। इस की नवीनता एवं पौष्टिकता तभी पनप सकेगी; जब भारत के प्रत्येक धर्म, संस्कृति समाज समन्वय भाव से समानता में आवें और आर्थिक तथा राजनैतिक स्वाभिमान कायम रखें।
इन बातों के समाधान में आज आदिवासियों तथा दलित कहलाये गये वर्गों का उत्थान व पुनरूत्थान सर्व प्रथम आवश्यक जान पड़ता है। क्योंकि ये आज तक तो अपने तत्व को भूल गये है; वंचित किए गये हैं तथा दिन व दिन किए भी जा रहें हैं। जो भी आज भारत सरकार द्वारा किए जा रहे अनुशंधानिक अटल परिश्रम पर राष्ट्रीय खजाने तक खाली किए जा रहे हैं; तथापि इसकी सच्चाई और असली सफलता दूर होती जा रही है। कारण यह है कि एक तो आदिवासी गरोह खुद ही 32 पाटकों में विभाजित हुए हैं और दूसरा उन के बीच जातीयता, गौत्रिकता अनावश्यक विछिन्नता के साथ, शिक्षित-अशिक्षित का राजनैतिक कुटनीति पढ़ा कर और टुकड़े किए जा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि मतलब साधी अनुशंधान से इसे सफलता कभी नहीं मिल सकती। सफलता तभी है जब इन्हें संग्रह कर सुसज्जित किया जाय।

एक तो समयानुकूल और प्रतिकूल का प्रभाव है, फिर इधर राजनैतिक चक्र का प्रकोप से धुआँतक की पिसाई का प्रश्न उठ खड़ा हुआ। परिस्थिति और वातावरण ने तो इस तरह ठुकरा दिया।
खैर वैज्ञानिकों को इशारा ही काफी है अब हमें समय सारिणि पर विचार विमर्श करना है। समय सारिणि क्या है ? समय सारिणि क्यों और कब कैसे आया ? समय ही आदि सांस्कृतिक के उपलक्ष कौन से मंच से लाया गया और उस का आरम्भ कब से चलता चला चलता आ रहा है। फिर यह भी देखना है कि आधुनिक युग में यह त्योंहारों पर क्या महत्व प्रदान करेगा जो मानव सभ्यता की प्रगति में रहस्य पहुँचा दें। सके / जिसका सतत् अनुसंधानिक परिश्रम “एटेःए तुर्तुङ पिटिका अकहाड़ा (आदि सांस्कृतिक इंस्टिच्यूट के जरिए कार्य रूपेण किया गया है। यह दल अपने गुप्त को लुप्त रहस्यों का पुनः छानवीन कर (कोल सूधात्मा यह प्रजापति) उपाधि का पुर्णजागरण दिया। जो समास्याओं को सामने रख कर 23 मार्च 1954 को अपने ही हाथों से औषधि तैयारी का व्यौरा तैयार कर दिया गया। कार्य को सुचारु रूप देने हेतु एक बहुमतीय विधान “कोल रूल” (शुद्धात्मिक विधान) से विख्यात किया गया।

इस प्रकार से अनुशंधानिक अर्थों से सम्बन्ध कर आदि का अहात्मा मन्तव्य पूजा “दुप्पुब दिशुम मरं वोङ्गा और चनाला दिशुम मरं वोङ्गा का समालोचन किया। फलस्वरूप अपने सिलसिले को दुप्पुब धर्म (आदि) दुपुब हुदा (आदि समाज) दुप्पुब दोष्तुर (आदि संस्कृतिक) धर्म जिसका हिन्दी साहित्यिक शब्द (आदि) अदात का गढ़न्त भाव दुप्पुब (अटल) अस्थित्व से अन्वेषर्णार्थक सिद्ध किया। अर्थात सचमुच अधुनिक सभ्यता पर साहित्य एंव सात्विक भोजन अर्थात साहित्य व्यक्तित्व एवं सामुहिक उन्नति का एक आईना है।
यह एक सुनहाला प्रतिविम्ब “शहर होरा” अर्थात स्वर्गीय पथ और समय सारिणि” लिटा “गोर्गोणिक” मानसिक सिद्धि नक्षत्र गणक लिखित सिद्धान्त रखा गया है। यह बात प्रतिशत सत्य है एटेःए तुर्तुङ अक्हाड़ा ने अमृतवाणी सत्याग्रह पर भी कदम रखा, जिसका अर्थ दवाब डालना नहीं बल्कि सिखाना है। आदि के लिए अब भाग्य के भरोसा रहना नहीं हैं। अपनी शक्तियों और प्रेरणा से आदि के प्रत्येक सिलसिला को समृद्धशाली बनाना है। आदिमी कोई रोज दायित्व को समझते थे और लिपि अक्षर और व्याकरण भी ज्ञान था।
जिसका एक संगीत प्रसिद्ध है- बहा दुरं

षिर्मा रेमा लिपि नोते रेमा। गोले तेरे लिपिञ नयुम मेया ।।                                                                                                                                                                                  षिर्मा रेमा लिपि नोते रेमा। वकणा तेरे लिपिञ चिना मेया ।।
गोले तेरे लिपिञ नयुम मेया।
नेगञ नुपुञ लेकञ नयुम मेया, बकणा तेदो लिपिञ चिना मेया।
नुङिञ ददञ लेकछत्र चिनामेया ।।
उसी प्रकार यह भी पता लगता है कि शरीर की बनावट पर भी ज्ञान था। जो शब्दं ब्रह्म अक्षरं पर ब्रह्म।
षिर्मा रेया लिपि नोते रेया षूषून कोदो लिपिम नेलानचि ?
षिर्मा रेया लिपि नोते रेमा
दूदूगार तेदोम नेलन गेचि ?
ऐसे ही गर्भदान संबंधी बातों की भी पता लग जाती हैं।
” सित लिङी गाड़ा तला कुँई बोन गेलेःए हेड दो टिलिञ वुरःकेड् टिलिञ बोगेःए हेड् दः दो लिङी हेन हयगो बा वगान दो।
खैर विद्वानों को समझदारी तो है ही अब हमे देखना है कि “लिटा गोर्गोणिड्” की उत्पति महाराजाधिराज लिटा के समय से हुआ। संस्कृति के आधार पर सर्व प्रथम राजस्व दायित्व का महापुरूष माना जाता है। और वह अपना समय सारिणी का प्रवर्तक माना गया है। यह इसीलिए मानव के लिए उचित हुआ; क्योंकि सृष्टि का कार्य आरम्भ में भी समय युक्त था और अभी भी सभ्यता के सिलसिले में वार्ताव्य कर्तव्य का ब्योरा समय ही से चलता चलाता आ रहा है।
मानव का जन्म से मृत्यु तक समय से रत रहता है इसलिए जिन्दगी का श्रृंखला समय पर निर्भर रहता है त्योहारों में समय सारिणी इसीलिए उपयुक्त किया जाता है क्योंकि शरीर विज्ञान के वंश पराम्परागत पूवर्जी के कार्य-कलाप की यादगारी तथा आदर्श का गौरव रखने के लिए किया जाता है और उसका रहस्य समय पर निर्भर रखता है।
भविष्य का फलाफल भी इसी से संलग्न है। ज्यों समय सारिणी दैहिक और संसारिक दोनो अवस्थाओं का दाता एवं कर्ता होता है। दोनों एक ही दृष्टि से आधारकृत करता है एक शरीर का गठन जिस तत्व को जो हिसाब में जिस ग्रह अथवा नक्षत्र पर होता है। पृथ्वी का भी उसी व्यास अनुकुल पर रचित है। इसलिए शरीर और पृथ्वी का सृष्टि विशेषता में घनिष्ट सम्बन्ध है, इसलिए अब हम इस सारिणी को दोनो ही दृष्टि में समानता पावेंगे कहने का तात्पर्य यह है कि आदि संस्कृति के विशालकाय विषय शारीरिक आद्यात्मा में इस तरह ग्राहिक है जिसका समय विफल पल घड़ी अथवा सेकेण्ड मिनट घंटा दिन-रात, सप्ताह, महीना, वर्ष युग एवं महायुग से विख्यात है। अपने ढंग से नामकरण रपिड्-जपिड् गुड़ि, अटोहरी, निदा-सिंगी, चन्डुःउ, षिर्मा बोचोर, काड तथा वर्ष की तीन ऋतुएँ शरद, गर्मी, वर्षा के चार-चार महीने का कुंचा डुमडुम, रिङ्गे-सिंगे, जेर्गा-जरगी से प्रसिद्ध है। यह बिल्कुल सही है। (1) षुकन सरदी मागे बदि (2) सेंदरा हपल बपल अचाड़ा (3) अतेन अदोर कोहरा जोनोम से ख्याति है। अपने ढंग से “अमल” है। अतः दिन का आरम्भ रात्री 11-57 से माना जाता है। सप्ताह का प्रथम दिन रवि (रूईहर) द्वितीय सोम (सुमीहर) मंगल (मुंगडुहर) बुध (बुधुहर) वृहस्पति (गुराहर) शुक्र (षुकराहर) शनि (षुनिहर) सृष्टि कालिक सप्तऋषियों के योग मे रखा गया है। इस तरह से वर्ष का पहला महीना मार्गशीर्ष (मागेचन्डुःउ) है फिर बादी, सेन्दरा, हपल, बपल, अचड़ा; अतेन, अद्रोर कारा जोनोम, षुकन सरदी से जाना जाता है, बारह महीना है।
महीना का गणना नया चाँद से आरम्भ होकर अमावस्या को अंतिम माना जाता है। जैसे गणना मुलुःउ, गपातेर, मेयंतेर, इन्दरीतेर, तेरतेरीतेर एनतेरतेरीतेर मिहाट, अटोहरी, इपिसिं, अंगरा, बोयटा, बासी, तासी अंञआइ, पोनाई शुल्क पक्ष हुआ और कंचाः गपातारा, मेयांतारा इन्दरीतारा, तेरतेरितारा, एनतेरततारा, आदिअटोहरीतारा, इपिसिंतारा, अंगरातारा, बोयटातारा, बासीतारा, तासीतारा, अरिड्, निरसंधि दोंसी दिन 30 दिन का महीना माना जाता है। बारह महीने में एक वर्ष माना जाता है जो पहले ही ऊपर अंकित किया जा चुका है।
वैसे ही त्योहार भी षुकन, मागे, ब्रहा, दोहम रूहा (होन ब्रहा) हेरमुट हेरोः, बड्तौली, जोमनमा से उपमा दिया गया है। इस में से मागे पर्व पहला और सबसे बड़ा
माना जाता है। जो वर्ष के पहले महीना मार्ग शीर्ष के नवमी से शुरू होकर कृष्णा पक्ष प्रतिपदा आठ दिनों तक माना जाता है। इस के साथ करम, सोहराय का भी ख्याति है। अब देखा जाय एक एक कर त्योहारों का रंगीन लहराता दृष्य अद्यत्मा मानव षरीर से किस प्रकार प्रारिंत हुआ है और इस सभ्यता के सिलसिले का साहित्य आईने पर भविष्य जीवन पर अपना अद्भूत प्रभुत्व जमाया है। इस के अलावे मरं वोंडा सोहराय और बोड़वोङजी कोलोम वोंगा भी है।

स्रोत – कोल हो संस्कृति दर्पण

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