Holong ka vaigyanik vyakhya
ह्लोङ (अणु/Molecule) का वैज्ञानिक व्याख्या
कोल हो समाज का ज्ञान किसी एक विषय तक सीमित नहीं है। यहाँ भाषा, प्रकृति, विज्ञान और अध्यात्म अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं। इसी समन्वित दृष्टि का सर्वोत्तम उदाहरण है ह्लोङ। आधुनिक विज्ञान जिस सूक्ष्म इकाई को अणु (Molecule ) कहता है, हो भाषा उसी सत्य को ह्लोङ कहकर व्यक्त करती है। पर ह्लोङ केवल अणु नहीं, बल्कि ऊर्जा, अग्नि, धनात्मक शक्ति और जीवन-बीज भी है।
हो भाषा में ह्लोङ :- अरवा चावल का अत्यंत बारीक चूर्ण
धूल, राख, सूक्ष्म कण के लिए प्रयुक्त होता है। यह स्पष्ट करता है कि हो समाज ने अनुभव से जाना कि पदार्थ को जितना सूक्ष्म किया जाए, वह अंततः ह्लोङ की अवस्था में पहुँचता है।
❤️वारङ चिति लिपि में शब्द-रचना
ह्लोङ = ह्यो + ह्लो + ओङ्
ह(ह्यो) = गति, वायु, उड़ना, क्रियाशीलता
👉ह्लोङ स्थिर नहीं है।
ल(ह्लो) = शांति, संतुलन, स्थायित्व, जीवन
👉गति के भीतर संतुलन है।
ङ(ओङ्) = दबाव, टक्कर, शक्ति, ऊर्जा, धनात्मक आवेश
👉ह्लोङ ऊर्जा का सक्रिय रूप है।
गतिशील + संतुलित + दबाव
जो कण गतिशील हो, संतुलित हो और जिसके भीतर ऊर्जा व दबाव हो वही ह्लोङ (अणु) है।
❤️आधुनिक विज्ञान के अनुसार :- अणु पदार्थ की मूल इकाई है। अणु निरंतर गति में रहता है। अणु में ऊर्जा निहित रहती है।
ह्लोङ के तीन मूल गुण:
@गति (ह्यो)
@संतुलन (ह्लो)
@ऊर्जा (ओङ्)
👉 यह तीनों गुण वैज्ञानिक अणु से पूरी तरह मेल खाते हैं।
प्रकृति में ह्लोङ सर्वत्र है:- मिट्टी में, जल में, वायु में अग्नि में, प्रकृति का कोई भी तत्व ऐसा नहीं जो सूक्ष्म स्तर पर ह्लोङ से न बना हो। इसलिए ह्लोङ को सृष्टि का बीज कहा जा सकता है।
❤️आध्यात्मिक दृष्टिकोण से “ह्लोङ” हो समाज का अध्यात्म तत्व-पूजा है, वस्तु-पूजा नहीं। ह्लोङ को अग्नि के रूप में पूजा जाता है क्योंकि अग्नि ऊर्जा का प्रत्यक्ष रूप है। अग्नि जीवन को सक्रिय रखती है। ह्लोङ = अग्नि = धनात्मक आवेश
❤️रंग-तत्व-पूजा हो अध्यात्म में
ह्लोङ (अग्नि) → सफेद
जल (हल्दी) → पीला
वायु (सिंदुर) → लाल
यह रंग सजावट नहीं, बल्कि ऊर्जा की अवस्थाएँ हैं।
जीवन-सूत्र :- पुरुष+स्त्री=बच्चा
हो दर्शन में जीवन का मूल सूत्र :-
पुरुष (ह्लोङ / सफेद / अग्नि) + स्त्री (जल / पीला)
= बच्चा (लाल / वायु)
प्राकृतिक रूप में :- आग + पानी = वायु
उर्जा + संतुलन = जीवन की गति
❤️हो समाज में पूजा का अर्थ :- किसी व्यक्ति को ईश्वर बनाना नहीं बल्कि प्रकृति के नियमों को समझना और सम्मान देना। ह्लोङ की पूजा का अर्थ है ऊर्जा का संयमित उपयोग। संतुलन की रक्षा, जीवन की निरंतरता
