Ho samaj aur bhasha sahitya par vistrt shodh lekh
हो साहित्य में वर्तमान समस्याएं
मैं अपना ही उदाहरण देता हूँ। मेरा मातृभाषा “हो” है। मैं बचपन से हो आषा में लोगों से बातें करते आ रहा हैं। जब मैं पढ़ने के लिए चक्रधरपुर टाउन आया, वहाँ मुझे हिंदी में बात करने में दिक्कत होता था। क्योंकि हमारे हो भाषा मैं ख, घ, छ, झ जैसे ऊँचा स्वर नहीं है। इस लिए मेरा वाक्य इस प्रकार होते थे- मैंने काना काया (मैंने खाना खाया)। ये एक उदाहरण था। ऐसे बहुत सारा शब्द है जिसका मेरा द्वारा उच्चारण होता ही नहीं था। अभी भी मैं जब हिंदी में बात करता हूँ तो कुछ कुछ शब्द बोल ही नहीं पता हूँ।
ये समस्या मेरे ही नहीं बाकी लोगों का भी है। मजे की बात तो यह है की हमारे समुदाय के शिक्षक भी हमारी स्थिति नहीं समझ सकते थे। वो उल्टा हमें गलती करने पर मरते थे। जब मैं 9 वां क्लास में प्रवेश किया तब हमें एक पेपर में भाषा चुनने का मौका मिला तो मैं भी अपनी मातृभाषा हो लिया और उसी में 10वां का बोर्ड परीक्षा भी लिखा।
अभी नई शिक्षा नीति के अनुसार प्राथमिक विद्यालय में भी मातृभाषा में पढ़ाने का प्रावधान है पर सरकार शिक्षक का बहाल करें तो हो पायेगा न। मैं अपने पंचायत “भरनिया” का ही बताता है। भरनिया पंचायत में 4 मध्य विद्यालय है। मेरा गाँव जांटा” में जांटा मध्य विद्यालय में 122 छात्राएं हैं और शिक्षक सिर्फ 3, टोकलो मध्य विद्यालय में 270 छात्राएं और शिक्षक 4, भरनिया विद्यालय में 273 छात्राएं और शिक्षक 6, और गूंजा मध्य में 130 छात्राएं और शिक्षक 21 मैं केवल अपना पंचायत का ही बताया था। टोकलो थाना में ऐसे भी विद्यालय है जहाँ शिक्षक भी नहीं है। यहाँ बाकी विषय पढ़ाने के लिय शिक्षक ही नहीं है मातृभाषा पढ़ाने वाले शिक्षक कहाँ मिलेंगे। ये तो स्कूल की बात थी।
अब कॉलेज की बात करते हैं। हमारे यहाँ कॉलेज में मातृभाषा “हो” ऑनर्स के लिए विषय तो है पर प्रोफेसर फिक्स नहीं है। छात्राएं घंटी आधारित शिक्षक के भरोसे में है। यूनिवर्सिटी में तो HOD भी कोई और है मतलब गैर आदिवासी है। अब छात्राओं का भावनाओं को समझने के लिए खुद का हो भाषा वाला प्रोफेसर भी नहीं है।
हो भाषा की पढ़ाई ही नहीं होगी तो साहित्यकार कहाँ से आएंगे। अभी जितने भी साहित्यकार है ज्यादातर तो देवनागरी लिपि में ही लिखते हैं। हो साहित्य, जो आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपराओं और पहचान को व्यक्त करता है, आज कई गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। यह केवल भाषा और साहित्य तक सीमित समस्या नहीं है. बल्कि इसमें भूमि और जंगल, बेरोजगारी और शिक्षा, तथा पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व से जुड़ी गहरी चिंताएँ भी शामिल हैं।
सबसे बड़ी समस्या इसकी लिपि को लेकर है। हालाँकि हो भाषा के लिए वारंग क्षिति लिपि को मान्यता प्राप्त है. लेकिन लेखन में देवनागरी और रोमन लिपि का भी प्रयोग किया जाता है। इससे भाषा का मानकीकरण कठिन हो जाता है और नए पाठकों तथा लेखकों के लिए यह असमंजस की स्थिति पैदा करता है। इसके अलावा, हो भाषा में लिखी गई पुस्तकों और पत्रिकाओं की संख्या सीमित है, और बड़े प्रकाशन हाउस इस भाषा में सामग्री प्रकाशित करने में रुचि नहीं लेते। डिजिटल युग में प्रवेश करने के बावजूद, हो साहित्य का ऑनलाइन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर समुचित विकास नहीं हो पाया है। ई-बुक्स, ब्लॉग और ऑडियोबुक जैसी सुविधाएँ अन्य भाषाओं में तो प्रचलित हैं, लेकिन हो साहित्य अभी इस क्षेत्र में पीछे है।
भूमि और जंगल का मुद्दा
हो समाज के लिए भूमि और जंगल सिर्फ आजीविका का साधन नहीं हैं, बल्कि यह उनकी संस्कृति और पहचान का एक अभिन्न अंग हैं। हालाँकि, औद्योगीकरण, शहरीकरण और सरकारी नीतियों के कारण आदिवासी समुदायों की भूमि छीनी जा रही है। बड़े-बड़े कारखानों, खनन परियोजनाओं और सड़क निर्माण के नाम पर आदिवासियों को उनके पारंपरिक आवासों से विस्थापित किया जा रहा है। हो साहित्य में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया जाना चाहिए ताकि समाज में जागरुकता बढ़े और अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति लोग सचेत हो सकें। यदि कहानियों, कविताओं और नाटकों के माध्यम से इस संघर्ष को दिखाया जाए, तो यह समाज की आवाज़ को बुलंद करने का प्रभावी तरीका बन सकता है।
बेरोजगारी और शिक्षा
हो समुदाय में शिक्षा का स्तर अभी भी मुख्यधारा की तुलना में पिछड़ा हुआ है। कई आदिवासी युवा उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी रोजगार के अवसरों से वंचित रह जाते हैं। सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति होने के बावजूद कई बार भाषा की बाधा, आर्थिक स्थिति, और संसाधनों की कमी के कारण वे प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं। कई युवाओं को शहरों में जाकर अनौपचारिक श्रम करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यदि हो साहित्य में शिक्षा और रोजगार से जुड़े मुद्दों को अधिक प्रभावी तरीके से उठाया जाए, तो यह समाज को नई दिशा देने में मदद कर सकता है।
पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व का संकट
हो भाषा और संस्कृति के अस्तित्व पर भी खतरा मंडरा रहा है। आधुनिकीकरण, शहरीकरण और मुख्यधारा की भाषाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण नई पीढ़ी धीरे-धीरे हो भाषा से दूर होती जा रही है। बहुत से युवा अब हिंदी, अंग्रेज़ी और अन्य आषाओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे हो साहित्य और संस्कृति धीरे-धौरे कमजोर होती जा रही है।
यह संकट केवल भाषा के प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि हो समाज की पारंपरिक कला, संगीत, नृत्य और रीति-रिवाजों के लुप्त होने का भी खतरा है। नई पीढ़ी को यदि अपनी संस्कृति और पहचान से जोड़े रखना है, तो हो साहित्य को रोचक और समकालीन रूप देना आवश्यक है।
हो आदिवासियों का विस्थापनः एक लुप्त होती विरासत
जंगलों के झुरमुट से गुजरती हुई हवा में कभी आदिवासी ढोल की थाप गूँजा करती थी। पहाड़ों की चोटियों से बहती नदियों के किनारे हो समाज अपने देवताओं को स्मरण करते हुए उत्सव मनाता था। मिट्टी की सौंधी गंध में उनकी संस्कृति की आत्मा बसती थी, लेकिन विकास की तेज आँधी ने उन खुशबुओं को धुएँ में बदल दिया।
जब टाटा नगर (जमशेदपुर), नोवामुंडी, जोडा, कालिंगा नगर, जादूगोड़ा, गुआ, किरीबुरु, मेघाहातुबुरु और चाईबासा के चलियामा में बड़े-बड़े उद्योगों की नींव रखी गई, तब इस भूमि के असली उत्तराधिकारियों (हो लोगों) को विस्थापन की पीड़ा झेलनी पड़ी। लोहे और कोयले की चमक में उनकी जमीनों की हरियाली गुम हो गई। विकास की कीमत उन्होंने अपनी पहचान, संस्कृति और सामूहिक अस्तित्व से चुकाई।
भूमि और जंगलः जो छूट गया पीछे
हो आदिवासियों के लिए जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि उनका घर था। वहाँ उनकी आत्मा बसती थी, उनकी आजीविका का आधार वहीं था। किंतु खदानों की खुदाई ने जंगलों की हरियाली को बेरंग बना दिया। नोवामुंडी, गुआ और किरीबुरु की लाल मिट्टी अब रक्त के धब्बों जैसी लगती है, जहाँ कभी उनकी फसलें लहलहाती थीं।
जो विस्थापित हुए, वे या तो अनजान शहरों में भटकते रहे, या अपनी ही जमीन पर मजदूर बन गए। खनन कंपनियों ने वादा किया था कि उन्हें पुनर्वास मिलेगा, लेकिन वे केवल उजड़े हुए घरों, बंजर भूमि और टूटे सपनों के साथ छोड़ दिए गए।
बेरोजगारी और शिक्षाः अंधकार में डूबी पीढ़ियाँ
शहरों की चकाचौंध में गाँव के उजाले कहीं खो गए। जिन स्कूलों में पहले हो भाषा के गीत गाए जाते थे, वहाँ अब बाहरी भाषाएँ हावी हो गई। शिक्षा का सपना तो दिखाया गया, लेकिन बेरोजगारी की कड़वी सच्चाई विस्थापित युवाओं के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न बनकर खड़ी हो गई।
जिन हाथों में कभी खेती के औज़ार होते थे, वे अब फैक्ट्रियों में सस्ते श्रमिक बनकर खड़े हैं। जिन्हें पढ़ाई का अवसर मिला, वे भी मुख्यधारा में जगह नहीं बना सके, क्योंकि उनके पास न कोई मार्गदर्शन था, न कोई अवसर। रोजगार देने के नाम पर उनके पुरखों की जमीन हड़प ली गई, और बदले में जो मिला वह सिर्फ वादों की गूंज थी।
पहचान और सांस्कृतिक अस्तित्व का संकट
हो आदिवासियों का जीवन केवल जीविका तक सीमित नहीं था, उनकी संस्कृति, रीति-रिवाज और त्योहारों में उनकी असली पहचान थी। सोहराय, मगहे परब, करम परब के गीत अब गुम होते जा रहे हैं। विस्थापन के बाद बहुत से लोग शहरों में बस गए, जहाँ वे अपनी ही भाषा बोलने में संकोच करने लगे।
यह केवल एक भौगोलिक विस्थापन नहीं था, यह सांस्कृतिक विस्थापन था। गाँवों की मिट्टी से जुड़े लोग अब कंक्रीट की बस्तियों में कैद हो गए। उनकी हल नृत्य की थापें अब केवल स्मृतियों में रह गई। परंपराओं के टूटने के साथ-साथ उनके देवताओं की पूजा भी छूटने लगी। भाषा का लोप होना केवल शब्दों का खो जाना नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता का विलुप्त होना है।
विकास या विनाश?
बड़े शहरों की ऊँची इमारतों को देखकर कहा जाता है कि विकास हुआ है, लेकिन इस विकास में जिनकी जड़े काट दी गई, वे कहाँ जाएँ? खनिज संपदा के दोहन से उद्योगपति समृद्ध हुए, लेकिन जिनकी भूमि से यह सब निकला, वे और भी गरीब हो गए। यह कैसा न्याय है, जहाँ जिनका घर लूटा गया, उन्हें ही बाहर कर दिया गया?
हो समाज के इस दर्द को सिर्फ आँकड़ों में नहीं मापा जा सकता। यह एक टूटते हुए सपने की दास्तान है, जो किसी सरकारी रिपोर्ट में दर्ज नहीं होगी। लेकिन क्या यह संभव है कि किसी पेड़ की जड़े काट दी जाएँ और वह फिर भी हरा-भरा रहे? संस्कृति की जड़ें जब कटती हैं, तो समाज केवल एक भीड़ बनकर रह जाता है।
आज जरूरत इस बात की है कि इस विस्थापन को केवल अतीत की त्रासदी न मानकर, इसे हो समाज के पुनरुत्थान का अवसर बनाया जाए। सरकार और उद्योगों को यह समझना होगा कि विकास तब तक अधूरा है, जब तक वह उन लोगों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं करता, जिनकी भूमि पर वह खड़ा है। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो इतिहास केवल यही याद रखेगा कि विकास की आंधी में एक समृद्ध संस्कृति के पन्ने बिखरकर खो गए।
हो साहित्यकार जवाहरलाल बॉकिरा जी अपने पुस्तक “देशाउलि और इमली का पेड़” के शीर्षक “पलायन और आदिवासी” में लिखते हैं-
ताकतवर और हिंसकों न पहले उन्हें
मैदानी इलाकों से जंगलों की ओर खदेड़ा
आज फिर जंगलों और बियाबानों से
उन्हें विकास के नाम पर
असुरक्षित स्थलों की ओर खदेड़ा जा रहा है।।
इस कविता में जवाहरलाल बॉकिरा जी हो आदिवासियों की दर्द को दिखा रहें हैं। उन्हें किस तरह कभी विकास के नाम पर तो कभी किसी योजना के नाम पर विस्थापित किया जा रहा है।
एक और कविता है “देशाउलि और इमली का पेड़ में ही इसका शीर्षक है ‘आदिवासी और मुख्यधारा” में लिखते हैं-
दूर दूर तक मुख्यधारा
नज़र नहीं आती
यह कैसे धारा है
जिसमें आदिवासी मिल नहीं पाता
उसकी रफ्तार को पकड़ नहीं पाता।।
जवाहरलाल बॉकिरा जी इस कविता के माध्यम से हमें आदिवासियों की वास्ताविकता को बता रहें हैं। हम आदिवासियों को इतना विकास व योजनाओं के नाम पर पलायन कर दिया गया है कि हम विकास के इस मुख्यधारा को पकड़ ही नहीं पा रहें हैं। हम उसके बारे सोच भी नहीं पा रहें हैं।
हो साहित्य के संरक्षण और संवर्धन के उपाय
हो साहित्य का संरक्षण और संवर्धन केवल भाषा को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण सांस्कृतिक आंदोलन है, जो हो जनजाति की पहचान, परंपराओं और इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है। इसके लिए विभिन्न स्तरों पर काम करने की जरूरत है, जिसमें शिक्षा, तकनीक, सरकारी पहल, साहित्यिक आयोजन और सामाजिक जागरूकता को शामिल किया जाना चाहिए।
शिक्षा प्रणाली में हो भाषा और साहित्य को स्थान देना
हो भाषा और साहित्य को संरक्षित करने का सबसे प्रभावी तरीका इसे शिक्षा से जोड़ना है। अगर बच्चे प्राथमिक स्तर से ही अपनी मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करेंगे, तो वे साहित्य, कविता और पारंपरिक जान को सहज रूप में आत्मसात कर सकेंगे। स्कूलों में हो भाषा के शिक्षक नियुक्त किए जाएं और हो साहित्य को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाए। विश्वविद्यालय स्तर पर भी हो साहित्य और भाषा में शोध के लिए विशेष संस्थान और विभाग स्थापित किए जाएं, जिससे नई पीढ़ी इसमें रुचि ले और इस पर गंभीर अध्ययन हो सके।
तकनीकी माध्यमों का उपयोग डिजिटलीकरण के इस दौर में हो साहित्य को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए तकनीकी माध्यमों का अधिकतम उपयोग किया जाना चाहिए। हो भाषा की किताबों को ई-बुक्स और ऑडियोबुक्स के रूप में उपलब्ध कराया जाए। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर हो साहित्य से जुड़ी वेबसाइट, ब्लॉग और डिजिटल लाइब्रेरी विकसित की जाएं, जहाँ से लोग आसानी से इस भाषा और साहित्य को पढ़ सकें।
यूट्यूब और पॉडकास्ट जैसे माध्यमों के जरिए हो भाषा की कहानियों, कविताओं और ऐतिहासिक घटनाओं को ऑडियो-वीडियो प्रारूप में प्रस्तुत किया जाए, जिससे नई पीढ़ी की इसमें रुचि बढ़े। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर हो भाषा में साहित्यिक सामग्री साझा करने से यह व्यापक स्तर पर पहुंचेगा और लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
सरकारी और गैर-सरकारी समर्थन
सरकार को हो भाषा और साहित्य को संरक्षित करने के लिए ठोस नीतियाँ बनानी चाहिए। आदिवासी साहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष अनुदान दिए जाएं और हो भाषा के साहित्यकारों, लेखकों और शोधकर्ताओं को आर्थिक सहयोग प्रदान किया जाए। सरकारी स्तर पर हो भाषा के साहित्यिक आयोजनों को बढ़ावा दिया जाए और राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस भाषा को पहचान दिलाने के प्रयास किए जाएं।
गैर-सरकारी संगठनों, साहित्यिक समूहों और सांस्कृतिक संस्थानों को भी इसमें योगदान देना चाहिए। हो भाषा के लेखकों और कवियों को मंच प्रदान करने के लिए साहित्यिक संगोष्ठियों, कार्यशालाओं और पुस्तक मेलों का आयोजन किया जाना चाहिए।
साहित्यिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन
‘सँया सनागोम, दुड़ दुदुगर (हो कवि सम्मेलन) 2024″ हो साहित्यकारों के द्वारा कोल्हान के चाईबासा स्थित कोल्हान यूनिवर्सिटी में एक दिवसीय सेमिनार रखा गया था। यह कार्यक्रम हो साहित्यकारों के द्वारा पहली बार रखा गया था। इसका उद्देश्य हो साहित्यकारों को एक मंच में लाना था। हो भाषा को लोकप्रिय बनाने के लिए ऐसे ही साहित्यिक प्रतियोगिताओं, कविता पाठ सत्रों, कहानियों के नाट्य रूपांतरण और पारंपरिक लोकगायन कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। ये कार्यक्रम युवाओं को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने में मदद करेंगे। इसके अलावा, हो साहित्य पर आधारित नाटक, फिल्में और वृत्तचित्र भी बनाए जाने चाहिए, जिससे यह व्यापक दर्शकों तक पहुँच सके।
नई पीढ़ी और साहित्य का भविष्य
नई पीढ़ी की भागीदारी के बिना हो साहित्य का भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता। इसके लिए यह जरूरी है कि युवाओं को अपनी भाषा और साहित्य से जोड़ने के लिए प्रेरित किया जाए। आधुनिक समय में युवा इंटरनेट और डिजिटल मीडिया से जुड़े हैं, इसलिए साहित्य को डिजिटल और इंटरैक्टिव रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक है। हो भाषा में मोबाइल ऐप्स, ऑनलाइन कोर्स और भाषा सीखने के प्लेटफॉर्म विकसित किए जाएं, जिससे युवा इसे सरलता से सीख सकें।
नई पीढ़ी की रचनात्मक अभिव्यक्ति को बढ़ावा देने के लिए साहित्यिक प्रतियोगिताएँ, ब्लॉगिंग, कहानी लेखन और कविता लेखन के कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। युवाओं को प्रेरित करने के लिए हो साहित्य से जुड़े लेखकों और कवियों की जीवन यात्राओं को प्रस्तुत किया जाए, ताकि वे जान सकें कि उनकी भाषा और साहित्य की कितनी समृद्ध विरासत है।
हो भाषा और साहित्य का वैश्विक स्तर पर प्रचार
2018-2024 के बीच अब तक दिल्ली के जंतर मंतर के पास अब तक चार बार हो भाषा को भारतीय संविधान के 8 वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए धारणा प्रदर्शन हो चुके है। ये आदिवासी हो समाज युवा महासभा के द्वारा 2018, 2019,2023 और 2024 में आयोजित किया गया था। हो भाषा को झारखण्ड में दूसरी राज्य भाषा के रूप में मान्यता मिली है।
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी हो, मुंडारी और कुडुख भाषाओं को 8वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा था।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आदिवासी हो समाज युवा महासभा के प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया है कि हो भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने पर विचार किया जाएगा।
ओडिशा सरकार, आदिवासी कल्याण विभाग की ओर से विभागीय तथा जनजाति सलाहकार परिषद ने ‘हो भाषा को भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने की सिफारिश की है।
हो भाषा और साहित्य को केवल झारखंड या भारत तक सीमित रखने के बजाय इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रस्तुत किया जाना चाहिए। अनुवाद कार्यों को प्रोत्साहित किया जाए, जिससे हो भाषा की कृतियाँ हिंदी, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध हो सकें। इससे न केवल इस भाषा को पहचान मिलेगी, बल्कि अन्य समुदायों को भी हो जनजाति की सांस्कृतिक समृद्धि का परिचय मिलेगा।
निष्कर्षः साहित्य के माध्यम से हो आदिवासी समाज का सशक्तिकरण
साहित्य किसी भी समाज की आत्मा होता है, और यह न केवल संस्कृति को संजोने का कार्य करता है, बल्कि समाज को जागरूक, शिक्षित और सशक्त भी करता है। हो आदिवासी समाज, जो अपनी समृद्ध परंपराओं, आषा और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, वर्तमान में कई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। इन चुनौतियों से निपटने और समाज को आत्मनिर्भर बनाने में साहित्य एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
1. सांस्कृतिक पहचान और भाषा का संरक्षण
साहित्य हो भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने का एक प्रभावी माध्यम हो सकता है। हो लोककथाओं, पारंपरिक गीतों, रीति-रिवाजों और इतिहास को लिपिबद्ध करना आवश्यक है, ताकि नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ी रहे। यदि हो भाषा में अधिक साहित्य सृजित किया जाए और इसे शिक्षा प्रणाली में शामिल किया जाए, तो यह भाषा संरक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक सशक्तिकरण का भी साधन बनेगा।
2. शिक्षा और जागरुकता का विस्तार
हो आदिवासी समाज के विकास के लिए शिक्षा अत्यंत आवश्यक है। साहित्य शिक्षा को सरल, रोचक और प्रभावी बना सकता है। यदि प्राथमिक स्तर पर हो भाषा में शिक्षा सामग्री विकसित की जाए, तो बच्चों की सीखने की प्रक्रिया अधिक सहज होगी। इसके अलावा, सामाजिक मुद्दों, अधिकारों और सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए साहित्य का उपयोग किया जा सकता है।
3. सामाजिक मुद्दों पर विमर्श और समाधान
हो समाज कई समस्याओं से जूझ रहा है, जैसे भूमि अधिकार, विस्थापन, बेरोजगारी, और राजनीतिक हाशिए पर रखा जाना। साहित्य के माध्यम से इन मुद्दों को उजागर किया जा सकता है और समाधान की दिशा में समाज को जागरूक किया जा सकता है। आदिवासी संघर्षों, उपलब्धियों और प्रेरणादायक कहानियों को साहित्य के माध्यम से प्रस्तुत करना, समाज में आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की भावना को बढ़ावा देगा।
4. डिजिटल प्लेटफॉर्म और वैश्विक पहचान
आज के डिजिटल युग में साहित्य को ऑनलाइन उपलब्ध कराना बहुत महत्वपूर्ण है। हो भाषा के साहित्य को डिजिटल प्लेटफॉर्म (ब्लॉग, ई-बुक्स, यूट्यूब, सोशल मीडिया) के माध्यम से बढ़ावा देने से यह वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है। इससे भाषा और संस्कृति को संजोने के साथ-साथ, नए लेखकों और शोधकर्ताओं को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
5. नए लेखकों और साहित्यकारों को बढ़ावा
हो समाज में साहित्य को मजबूत करने के लिए नए लेखकों और कवियों को प्रेरित करना आवश्यक है। यदि युवा लेखक, कवि और शोधकर्ता हो समाज के इतिहास, संस्कृति और सामाजिक विषयों पर लेखन करें, तो यह समाज की सांस्कृतिक समृद्धि को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है। साहित्यिक कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और साहित्यिक मंचों के माध्यम से इन्हें प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
साहित्य केवल एक रचनात्मक अभिव्यक्ति का साधन नहीं है, बल्कि यह हो आदिवासी समाज के लिए जागरूकता, शिक्षा और सशक्तिकरण का एक प्रभावी उपकरण भी हो सकता है। यदि हो भाषा में साहित्य को संरक्षित और प्रचारित किया जाए, समाज की समस्याओं को इसमें स्थान दिया जाए, और इसे डिजिटल और शैक्षिक मंचों तक पहुँचाया जाए, तो यह हो समाज को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
आभार व्यक्त
इस लेख को तैयार करने में अनेक व्यक्तियों का सहयोग और मार्गदर्शन मिला, जिनका मैं हृदय से आभार व्यक्त
करता हूँ।
सबसे पहले, मैं श्री जवाहर लाल बॉकिरा जी का विशेष धन्यवाद करता हूँ, जिन्होंने इस लेख को लिखने में मेरी सहायता की। उन्होंने न केवल अपने बहुमूल्य सुझाव दिए, बल्कि मुझे अपनी लिखी पुस्तकों के साथ-साथ इस लेख के लिए आवश्यक अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ भी उपलब्ध कराए।
मैं डॉ. मिनाक्षी मुंडा जी का भी आभार प्रकट करता हूँ, जिन्होंने लेख को सही क्रम में प्रस्तुत करने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिए। ज्ञान सिंह दोराईबुरु और माझी राम जामुदा जी को भी हृदय से धन्यवाद, जिन्होंने लेखन के दौरान शोध कार्य में आने वाले आर्थिक पक्ष पर विशेष ध्यान दिया और सहायता प्रदान की।
इसके अलावा, विशाल मुंडा, कृष्णा दिग्गी और साधु हो का भी विशेष धन्यवाद, जिन्होंने यात्रा के दौरान मेरा सहयोग किया।
मैं मुक्ता माई मुंडा का आभारी हूँ, जिन्होंने व्याकरण संबंधी सुधारों में मदद की, और पूनम देवगम को भी धन्यवाद, जिन्होंने इस लेख की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के लिए इसकी प्रूफरीडिंग की।
इस लेख को पूरा करने के लिए मैंने निम्नलिखित पुस्तकों का अध्ययन कियाः
“हो लोक साहित्य” डॉ. लक्ष्मी पिंगुआ जी
“हो लोककथाः एक अनुशीलन” डॉ. आदित्य प्रसाद जी
“हो भाषा-साहित्य आंदोलन का इतिहास” दोबरो बुडीउली जी
“सिंहभूम का इतिहास” ललिता सुंडी जी
“देशाउलि और इमली का पेड़ जवाहर लाल बॉकिरा जी
“हो दिसुम हो होने को” (भाग 7) धनुर सिंह पुरती जी
इन सभी पुस्तकों ने मेरे लेख को समृद्ध करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सभी सहयोगियों और विद्वानों के प्रति मेरा हृदय से आभार!
शोधार्थी – Madhusudan Bamai Rabindra Gilua
